मुख्यपृष्ठस्तंभमेगा-प्लान : मुंबई डीकन्जेशन का नया रास्ता...फ्लेक्सिबल ऑफिस टाइम और वैकल्पिक अवकाश...

मेगा-प्लान : मुंबई डीकन्जेशन का नया रास्ता…फ्लेक्सिबल ऑफिस टाइम और वैकल्पिक अवकाश व्यवस्था जरूरी

अनिल तिवारी, मुंबई

मुंबई की ट्रैफिक समस्या केवल सड़कों, सिग्नल्स, गाड़ियों और ट्रैफिक पुलिस की समस्या नहीं है। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि शहर एक ही समय पर जागता है, एक ही समय पर दौड़ता है और एक ही समय पर थककर घर लौटता है। सुबह ८ से ११ बजे और शाम ५ से ९ बजे के बीच मुंबई की सड़कें, लोकल ट्रेनें, मेट्रो, बसें, ऑटोरिक्शा, टैक्सी और ऐप कैब, सब एक साथ दबाव में आ जाते हैं। करोड़ों की आबादी वाले महानगर को यदि सभी लोग एक ही समय पर सड़क और रेल नेटवर्क पर उतार देंगे, तो दुनिया की कोई भी व्यवस्था उसे सहजता से संभाल नहीं सकती। इसलिए मुंबई को डीकन्जेस्ट करने के लिए अब केवल सड़क निर्माण नहीं, बल्कि समय प्रबंधन को भी ट्रैफिक नीति का हिस्सा बनाना होगा।
वर्क-शिफ्ट और समय प्रबंधन
जिस तरह शहर में सड़कें सीमित हैं, उसी तरह पीक आवर्स की क्षमता भी सीमित है। यदि ऑफिस, स्कूल, बाजार, सरकारी कार्यालय, कॉरपोरेट दफ्तर, सेवा क्षेत्र और निजी संस्थान एक ही समय पर खुलेंगे और बंद होंगे, तो भीड़ बननी ही है। इसका समाधान है, फ्लेक्सिबल ऑफिस टाइम, शिफ्ट आधारित कार्य व्यवस्था और वर्क प्रâॉम होम का संस्थागत विस्तार।
मुंबई में सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों के कार्यालयों के लिए चरणबद्ध रूप से दो प्रमुख कार्य-शिफ्ट लागू की जा सकती हैं। पहली शिफ्ट सुबह ७ बजे से दोपहर २ बजे तक हो। दूसरी शिफ्ट दोपहर ३ बजे से रात १० बजे तक हो। यह व्यवस्था हर क्षेत्र में एक साथ लागू करना संभव नहीं होगा, लेकिन बैंकिंग सपोर्ट, आईटी, मीडिया, कॉल सेंटर, बैक ऑफिस, प्रशासनिक काम, डेटा प्रोसेसिंग, कस्टमर सपोर्ट, कॉरपोरेट सेवाएं, बीमा, वित्तीय सेवा, संपत्ति प्रबंधन, डिजिटलीकरण, दस्तावेजी कार्य और कई सरकारी विभागों में इसे लागू किया जा सकता है। इससे सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि सड़क और लोकल ट्रेन नेटवर्क पर सुबह-शाम का दबाव विभाजित हो जाएगा। जो लोग सुबह ७ बजे काम शुरू करेंगे, वे दोपहर २ बजे लौटेंगे। जो लोग दोपहर ३ बजे काम शुरू करेंगे, वे देर रात लौटेंगे। इससे वर्तमान पीक आवर का एक बड़ा हिस्सा पैâल जाएगा। लोकल ट्रेन, मेट्रो और बसों में अचानक उमड़ने वाली भीड़ कम होगी। सड़क पर एक ही समय में निजी वाहनों की संख्या घटेगी। ऑटोरिक्शा, टैक्सी और ऐप कैब की मांग भी संतुलित होगी। यह व्यवस्था केवल ट्रैफिक कम करने के लिए नहीं, बल्कि उत्पादकता बढ़ाने के लिए भी उपयोगी हो सकती है। कई लोग सुबह जल्दी काम करने में अधिक सक्षम होते हैं, जबकि कई लोग दोपहर या शाम के समय बेहतर काम कर सकते हैं। यदि संस्थान कार्य के स्वरूप के अनुसार शिफ्ट तय करें, तो कार्यालयों की उपयोगिता भी बढ़ेगी। एक ही भवन, एक ही पार्विंâग, एक ही बिजली-सुविधा, एक ही बैठक कक्ष और एक ही परिवहन ढांचा दिन में अधिक समय तक उपयोग में आ सकेगा। इससे शहर की मौजूदा अवसंरचना का बेहतर उपयोग होगा।
वर्क फ्रॉम होम: एक निश्चित राहत!
दूसरा बड़ा कदम है यथासंभव वर्क फ्रॉम होम नीति। महामारी के दौरान यह सिद्ध हो चुका है कि कई प्रकार के काम बिना रोजाना दफ्तर आए किए जा सकते हैं। फिर भी महामारी के बाद अनेक कंपनियां कर्मचारियों को फिर से प्रतिदिन कार्यालय बुलाने लगीं। मुंबई जैसे शहर में यह व्यावहारिक नहीं है। जिन कर्मचारियों का काम कंप्यूटर, फोन, रिपोर्ट, अकाउंटिंग, लेखन, संपादन, डिजाइन, सॉफ्टवेयर, दस्तावेजी प्रक्रिया, ऑनलाइन मीटिंग या डिजिटल समन्वय से हो सकता है, उन्हें सप्ताह में दो से तीन दिन वर्क फ्रॉम होम देना अनिवार्य किया जाना चाहिए। वर्क फ्रॉम होम केवल कर्मचारी की सुविधा नहीं, शहर की राहत है। यदि किसी कंपनी के १,००० कर्मचारी हैं और उनमें से ४०० कर्मचारी सप्ताह में दो दिन घर से काम करते हैं, तो हर सप्ताह हजारों यात्राएं कम होंगी। यदि पूरे मुंबई महानगरीय क्षेत्र में लाखों कर्मचारी इसी मॉडल पर आएं, तो लोकल ट्रेन, बस, मेट्रो और सड़कों पर दबाव उल्लेखनीय रूप से कम हो सकता है। इससे र्इंधन बचेगा, प्रदूषण घटेगा, यात्रा तनाव कम होगा और कर्मचारियों का उत्पादक समय बढ़ेगा। सरकार को चाहिए कि वह बड़ी कंपनियों, आईटी पार्क, कॉरपोरेट हाउस, बैंकिंग संस्थानों, बीमा कंपनियों, मीडिया हाउस, सरकारी विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों के लिए ‘URan Mobility Responsibility’ जैसी नीति बनाए। जैसे कंपनियों पर पर्यावरण, सुरक्षा और श्रम नियमों का पालन अनिवार्य होता है, वैसे ही महानगरों में यातायात दबाव कम करने की जिम्मेदारी भी संस्थानों पर होनी चाहिए। हर बड़े कार्यालय को यह बताना चाहिए कि उसके कितने कर्मचारी प्रतिदिन यात्रा करते हैं, कितनों को वर्क प्रâॉम होम दिया जा सकता है, उसकी बस/शटल व्यवस्था क्या है और वह पीक आवर्स में शहर पर कितना बोझ डाल रहा है।
वैकल्पिक अवकाश नीति
तीसरा महत्वपूर्ण सुझाव है, सार्वजनिक अवकाश व्यवस्था का पुनर्गठन। आज अधिकांश सरकारी और निजी कार्यालय कई सार्वजनिक छुट्टियों पर एक साथ बंद रहते हैं। इससे दो समस्याएं पैदा होती हैं। पहली, छुट्टी के पहले और बाद के दिनों में काम का दबाव अचानक बढ़ जाता है। दूसरी, शहर की आर्थिक और प्रशासनिक गतिविधि एक साथ रुक जाती है। आधुनिक चौबीसों घंटे कार्य-संस्कृति वाले समय में यह विचार करने योग्य है कि क्या हर छुट्टी पर हर कार्यालय का बंद होना आवश्यक है? भारत विविध धर्मों, परंपराओं और समुदायों का देश है। इसलिए एक अधिक व्यावहारिक व्यवस्था यह हो सकती है कि सभी कर्मचारियों के लिए कुल वार्षिक छुट्टियों की संख्या समान रहे, लेकिन धार्मिक/सांस्कृतिक अवकाशों में विकल्प मिले। उदाहरण के लिए, हिंदू पर्व पर हिंदू कर्मचारी अवकाश ले सकें और अन्य धर्मों के कर्मचारी चाहें तो काम पर आ सकें। इसी तरह ईद, क्रिसमस, गुरु पर्व, पारसी नववर्ष या अन्य धार्मिक अवसरों पर संबंधित समुदाय के कर्मचारियों को प्राथमिक अवकाश मिले, जबकि अन्य कर्मचारी काम करना चाहें तो कर सकें। इससे किसी की धार्मिक स्वतंत्रता कम नहीं होगी, बल्कि विकल्प बढ़ेगा। यह व्यवस्था सावधानी से लागू करनी होगी। इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि किसी कर्मचारी पर धर्म के आधार पर काम करने या न करने का दबाव बने। प्रत्येक कर्मचारी को अपनी पसंद के त्योहारों और निजी अवसरों के अनुसार चुनी हुई छुट्टियां लेने का अधिकार हो। कुल अवकाश समान रहें, पर सभी कार्यालय एक साथ बंद न हों। इससे कार्यालयों में कार्य का प्रवाह बना रहेगा, जनता के काम रुकेंगे नहीं, फाइलें लंबित नहीं होंगी और छुट्टी के बाद अचानक उमड़ने वाली भीड़ कम होगी।
भविषय की दिशा और क्रियान्वयन
सरकारी कार्यालयों में यह व्यवस्था विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है। आज कई बार छुट्टियों की शृंखला के कारण नागरिकों के काम कई दिनों तक अटक जाते हैं। फिर कार्यालय खुलते ही भीड़ बढ़ती है, फाइलों का दबाव बढ़ता है और नागरिकों को लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ती है। यदि वैकल्पिक अवकाश व्यवस्था हो, तो कार्यालयों में न्यूनतम स्टाफ हमेशा मौजूद रहेगा। इससे नागरिक सेवाएं निरंतर चलेंगी और पेंडिंग काम घटेंगे। इसका असर मुंबई की लोकल ट्रेनों पर भी पड़ेगा। मुंबई की लोकल ट्रेनें शहर की धड़कन हैं, लेकिन पीक आवर्स में वे अपनी क्षमता से कहीं अधिक दबाव झेलती हैं। यदि ऑफिस टाइम विभाजित हो, सप्ताह में दो-तीन दिन वर्क प्रâॉम होम हो और छुट्टियां वैकल्पिक हों, तो लोकल ट्रेनों की भीड़ स्वाभाविक रूप से कम होगी। मेट्रो और बस सेवाओं को भी राहत मिलेगी। इससे यात्रियों की सुरक्षा और यात्रा गुणवत्ता दोनों सुधरेंगी। इस व्यवस्था को लागू करने के लिए सरकार को चरणबद्ध नीति बनानी चाहिए। पहले बड़े सरकारी कार्यालयों, मंत्रालयों, मनपा, सार्वजनिक उपक्रमों और कॉरपोरेट कार्यालयों में पायलट प्रोजेक्ट शुरू हो। फिर बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स, नरीमन पॉइंट, लोअर परेल, अंधेरी, पवई, ठाणे, नई मुंबई और मालाड जैसे रोजगार केंद्रों में संस्थागत रूप से लागू किया जाए। हर क्षेत्र के लिएtraffic impact study हो। यदि किसी क्षेत्र में सुबह ९ से ११ बजे ५० हजार कर्मचारी पहुंचते हैं, तो उनमें से कितनों को पहले या बाद की शिफ्ट में स्थानांतरित किया जा सकता है, यह आंकड़ों से तय हो।
बेशक, इस व्यवस्था की चुनौतियां भी होंगी। देर रात लौटनेवालों की सुरक्षा, महिलाओं की यात्रा, सार्वजनिक परिवहन की उपलब्धता, बच्चों की स्कूल टाइमिंग, परिवार का समय, बिजली और ऑफिस संचालन लागत जैसे प्रश्न उठेंगे। लेकिन इनका समाधान संभव है। दूसरी शिफ्ट वालों के लिए सुरक्षित बस/शटल सेवा, रात की मेट्रो/बस प्रâीक्वेंसी, कंपनी परिवहन, महिला सुरक्षा प्रोटोकॉल, डिजिटल उपस्थिति और लचीले काम के घंटे लागू किए जा सकते हैं। मुंबई को समझना होगा कि केवल नई सड़कें बनाकर वह जाम से मुक्त नहीं होगी। शहर को अपने समय का पुनर्गठन करना होगा। सड़क वही रहेगी, लेकिन यदि उस पर उतरने का समय बदल दिया जाए, तो जाम की तीव्रता घट सकती है। यह सबसे सस्ता, सबसे तेज और सबसे प्रभावी उपायों में से एक है। आज के युग में जब बैंकिंग, आईटी, मीडिया, सेवा क्षेत्र, ई-कॉमर्स, हेल्थकेयर, आपात सेवाएं और वैश्विक व्यवसाय चौबीसों घंटे काम कर रहे हैं, तब एक ही पारंपरिक १० से ६ मॉडल पर टिके रहना मुंबई जैसे शहर के लिए व्यावहारिक नहीं है। मुंबई को नई कार्य-संस्कृति अपनानी होगी, जहां काम भी चले, शहर भी चले और नागरिक भी कम तनाव में रहें। अर्थात, मुंबई को डीकन्जेस्ट करने का मंत्र स्पष्ट है, ‘सड़कें सीमित हैं, समय को पैâलाइए; कार्यालयों को लचीला बनाइए, शहर को सांस लेने दीजिए।’

अन्य समाचार