सुरेश मिश्र
अबकी तू लड़ि लेत्या
परधानी, सजनवां हमरे
नायिका ने पिछली बार प्रियतम से कहा था कि परधानी का चुनाव लड़कर गांव में ही रहिए। अब परदेस जाने की जरूरत नहीं है। वह नहीं माने और परदेस चले गए। जो प्रधान बने उनका दो तल्ले का घर बन गया, इस्कार्पियो गाड़ी आ गई। इस बार फिर से चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हुई तो उसने अपने साजन को समझाया-
अबकी तू लड़ि लेत्या परधानी, सजनवां हमरे।
कबहूं मुंबइया जइब्या, कबहूं कलकत्ता जइब्या
साजन परदेसी बनिके, कबले तू धक्का खइब्या
केतना सहिब्या सबके मनमानी, सजनवां हमरे।
केउ बोलइ छुट्टी ना बा, केउ के टिकटवा ना बा
गउवां मा रहिब्या साजन, कवनउ झंझटवा ना बा
बनिके हम रहिबइ राजा-रानी सजनवां हमरे
रिक्शा में का बा सइयां, टैक्सी में का बा सइयां
परधानी में भी अबतो, बहुतइ रुतबा बा सइयां
गउवां में बाटइ दाना-पानी, सजनवां हमरे
जब चाही कमवां करबइ, या हम आरामवां करबइ
पिंकी के पापा आवा, अब चारिउ धमवां करबइ
बदलल जाई अब सकल कहानी, सजनवां हमरे
परधानी जीतल जाई, मिलिके गउवां चमकाई
इंटरनेट बा गउवां में, हिंग्लिश मा होइ पढ़ाई
दरवानी से बा नीक किसानी, सजनवां हमरे
अबकी तू लड़ि लेत्या परधानी सजनवां हमरे।
