कालू सुबह-सुबह स्कूल जा रहा था। उसकी मां टिफिन बना रही थी। बना कर क्या, बल्कि जुगाड़ करके दे रही थी। टिफिन में रोटी और अचार था। अचार से कालू को बड़ा प्यार था। उसके रोज के टिफिन में अधिकतर अचार ही होता था।
कालू के चले जाने के बाद उसकी मां अपने आगे के कामों में लग गई। सूरज अब तक आंगन में फैलकर बैठ गया था। मोरनी पंख फड़फड़ाते हुए जोर की आवाज के साथ धम्म से छत पर लगे खपड़ों पर आ बैठी। पंख फड़फड़ाते और फैलाते हुए उसने मधुर स्वर में तान भी छेड़ दी। बहुत दिनों बाद अपने घर पर मोरनी को देखकर कालू की मां को अच्छा लगा। उन्हें लोग उनके नाम से नहीं, बल्कि ‘भिलमपुर वाली’ नाम से जानते थे। भिलमपुर वाली को बहुत खुशी हुई। आज बहुत दिनों बाद उन्होंने मोरनी को देखा था।
आंगन में लगे नल के पास बने चबूतरे पर बैठकर बर्तन मांजते हुए भिलमपुर वाली मन ही मन गाने लगीं—
“नाचै मगन मन मोर, अंगनवा झूमै लगे।
निमिया झूमै, पीपरा झूमै, पवनवा घूमै लगे।।”
“भिलमपुर वाली हऊ हो…, हे भिलमपुर वाली…” दो-तीन बार आवाज देने के बाद भी जब कालू की मां ने कुछ नहीं कहा, तो गुस्से में लाल, दरवाजे पर बिस्तर पर पड़ी और बीमारी से कराहती सासू मां ने अपने बगल में रखी लाठी से बखारी पर रखा एक झोला गिरा दिया।
धड़ाम! की आवाज पूरे घर में गूंज गई।
खड़बड़ाकर खड़ी हो गईं भिलमपुर वाली। चकर-पकर चारों ओर निहारने लगीं।
“अम्मा… हेऽ अम्मा..!”
अब अम्मा को दांव मिल गया था और गुस्से में तमतमाती अम्मा जानबूझकर कुछ नहीं बोल रही थीं।
“चिल्लाऽ… अउर छिल्लाऽ…, अब हमहूं न बोलब।” — मन ही मन बूढ़ी बोलीं।
दौड़ते हुए कालू की मां अब तक दरवाजे पर आ गई थीं।
“बूढ़ा नाहीं तऽ…, पूछत हई त बोलतउ नाइ हइन हऽ।”
“हमरे बोलाए पे तूं बोलु हऽ काऽ…, जवन हम बोली।” — मुंह फुलाए दादी अम्मा बोल पड़ीं।
“अच्छऽ, त हम नाइ सुनि पाए रहे त का तोहऊं नाइ सुनि पाए रहू? अच्छऽ बतावऽ, केथा बदे बोलावत रहू।”
“अबहीं कि बिलौटिया आइ रही। बतावत रही कि बंमई में मजे क पानी बरसत बाऽ। कुलि टेसन-ओसन में पानी भरि गवा बाऽ। रेलगड़ियउ कुलि ठप्प होइ गइ हइन। चाले वाले मजेक घरन में पानी ओलियाइ गइ बाऽ। हे दुल्हनिया, अई देखते कवनउ से पता करवउते अपने मुसइया क का हाल बाऽ?”
बंबई में बाढ़…!
सुनते ही भिलमपुर वाली बौखलाहट से भर गईं। उन्हें सात बरस पहले की बात याद आ गई, जब वे भी वहीं थीं और घरों में पानी घुस गया था। सड़क से बहता हुआ सामान कमरे के भीतर तक आ रहा था। लोग किसी तरह अपना सामान बेड और मेज पर रख-रखकर बचाने का जुगाड़ कर रहे थे। दिन तो किसी तरह गुजर गया था, पर शाम होते ही माहौल भयावह होने लगा।
भिलमपुर वाली ने बल्ब जलाने के लिए बटन दबाया। यह क्या! बिजली तो थी ही नहीं। अगल-बगल पूछने पर पता चला कि काफी देर से बिजली गुल है। यह सुनकर उनका मन धक् से रह गया कि बिना बिजली, वह भी इतनी बारिश और अंधेरे में, कैसे रहा जाएगा? पूरी रात बैठकर गुजारनी पड़ी थी।
बारिश का वह पूरा दृश्य कालू की मां की आंखों के सामने फिर से नाच उठा।
बंबई का हाल जानने के लिए बेचारी टीवी चलाने दौड़ीं। बटन भी दबा दिया, पर यह क्या!
“बिजली तो यहां भी नहीं है।” — मन ने धीरे से कहा।
आंखों ने मन से संपर्क किया और उसके गम में शामिल होते हुए कुछ बूंदें भी टपका दीं। दर्द भिलमपुर वाली के चेहरे पर भी उतर आया था कि पता नहीं कैसे होंगे वे।
किस हालत में होंगे और कहां बसेरा होगा उनका? खाना खाए होंगे या नहीं?
क्रमशः
पंकज तिवारी
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं।)
