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संपादकीय : मुंबई महानगरपालिका पर गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज करो!.. ‘सेवक’ चले गए; ‘खाते-पीते’ आ गए!

पहली ही बारिश में मुंबई की जिंदगी पूरी तरह पटरी से उतर गई है। यह सीधे तौर पर मुंबई महानगरपालिका की नाकामी है। जनजीवन सिर्फ ठप ही नहीं हुआ है, बल्कि इससे भाजपा का ढोंग, उसकी क्रूरता और भ्रष्टाचार भी खुलकर सामने आ गया है। रितु तावडे ने मेयर के तौर पर घूमना-फिरना जारी रखा है। पिछले दिनों वे जलजमाव से बेहाल मुंबई का जायजा लेने निकली थीं। जाहिर है, लाव-लश्कर साथ में था ही। इसी लश्कर का एक इंजीनियर खुद मेयर साहिबा के सामने ही एक गड्ढे में जा गिरा और बुरी तरह जख्मी हो गया। इसी हफ्ते चेंबूर में एक स्कूल बस पर पेड़ गिर गया, जिसमें एक मासूम बच्चे की जान चली गई। इसके बाद साकीनाका इलाके में एक खुले मैनहोल में गिरने से एक शख्स की दर्दनाक मौत हो गई। इन हादसों के लिए मुंबई मनपा के कमिश्नर को जिम्मेदार ठहराते हुए डिप्टी मेयर घाडी ने जमकर हंगामा काटा। घाडी ‘मिंधे’ (शिंदे) गुट से ताल्लुक रखते हैं। डिप्टी मेयर घाडी ने कमिश्नर अश्विनी भिड़े का इस्तीफा मांगकर खलबली मचा दी है। लेकिन क्या मुंबई की इस बदहाली के लिए सिर्फ कमिश्नर ही जिम्मेदार हैं? नगर विकास विभाग के मंत्री तो खुद ‘मिंधे’ हैं। इसलिए महानगरपालिका में पैâला भ्रष्टाचार और ठेकेदारों की मनमानी ही इन हादसों और मासूमों की मौतों के लिए जिम्मेदार है। कमिश्नर श्रीमती भिड़े इस भ्रष्टाचार और दलाली को रोकने में नाकाम रही हैं इसीलिए दो बेगुनाहों की मौत का पाप का ठीकरा उनके सिर फूटा है। मिंधे सेना के डिप्टी मेयर इस मामले में कमिश्नर साहिबा का इस्तीफा मांग रहे हैं। इसे कहते हैं अक्ल का दिवालियापन! अगर कमिश्नर की गलती है तो नगर विकास मंत्री को अश्विनी भिड़े का तबादला कर देना चाहिए; लेकिन क्या डिप्टी सीएम मिंधे में श्रीमती भिड़े का तबादला करने की हिम्मत और अधिकार है? इसका मतलब यह है कि महानगरपालिका की राजनीति प्रशासन को काम ही नहीं करने देती। मुलुंड का ‘पोपटलाल’ बात-बात पर मनपा मुख्यालय में घुस आता है और
बांग्लादेशियों को चुन-चुनकर खदेड़ने के लिए
कमिशनर पर दबाव बनाता है। असल में, बांग्लादेशियों को खदेड़ने का काम मुंबई महानगरपालिका का नहीं, बल्कि देश के गृह मंत्रालय का है। इसलिए पोपटलाल को मुंबई मनपा में अपनी राजनीति का डांडिया खेलने के बजाय दिल्ली जाकर गृहमंत्री अमित शाह के दफ्तर में घुसना चाहिए और उनसे पूछना चाहिए कि ‘बांग्लादेशियों को कब निकाल रहे हो?’ मुंबई मनपा में इस मुद्दे पर फिजूल की हांक लगाने के कारण ही बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सारे काम ठप पड़ गए, जिसकी कीमत दो मासूमों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। मानसून से पहले मनपा ने न तो नालों की सफाई की, न सड़कों की मरम्मत की और न ही पेड़ों की छंटाई की। जो पेड़ कभी भी गिर सकते थे, उन्हें काटा तक नहीं गया। नतीजा यह हुआ कि जैसे ही बारिश तेज हुई, सड़कों पर अनगिनत पेड़ उखड़कर गिर गए और ट्रैफिक जाम ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया। मेयर रितु तावडे ने मानसून से पहले आधिकारिक तौर पर एलान किया था कि १०४ प्रतिशत नालों की सफाई हो चुकी है। १०० प्रतिशत सफाई तो समझ आती है, लेकिन यह १०४ प्रतिशत सफाई का क्या गणित है? ऊपर का यह ४ प्रतिशत किसका है? इसे कहां से लाया गया? मुंबई मनपा में सरकार द्वारा तैनात की गई मैडम कमिश्नर तो बैठी हैं, लेकिन आज भी वहां राज चल रहा है सरकार के चहेते ठेकेदारों का। कमिश्नर अश्विनी भिड़े कहती हैं कि जिन ठेकेदारों ने नालों की सफाई ठीक से नहीं की और जिनकी लापरवाही से लोगों की जानें गईं, उन ठेकेदारों के खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई जाए। कमिश्नर मादाम, काम के मामले में आपकी साख अच्छी रही है। आपको ‘मेट्रो वुमन’ के नाम से जाना जाता है। मुंबई में मेट्रो के लिए आपने बड़े-बड़े टनल तैयार करवा दिए, लेकिन कमिश्नर के तौर पर आप मुंबई की सड़कों के गड्ढे नहीं भरवा पार्इं और
नालों की सफाई का हुआ बंटाधार
को आप रोक नहीं सकीं। ऐसे में क्या आप कमिश्नर की कुर्सी के साथ न्याय करने के लायक हैं? भाजपा के लोग भी महानगरपालिका को लूट-लूटकर खा रहे हैं। ऊपर से मुंबई के इस खौफनाक मंजर पर माफी मांगने के बजाय, भाजपा के मुंबई अध्यक्ष साटम – नामक ‘चाटम’ मीडिया के कैमरों के सामने बेहद बेशर्मी से हंसते हुए कहते दिखे, ‘कल पेड़ का मामला, आज मैनहोल का।’ यह सिर्फ संवेदनहीनता नहीं, बल्कि मानसिक विकृति है। यह वह अहंकार है, जो ठेकेदारों से उगाही करके अपनी तिजोरियां भरने से आता है। इसी मानसिकता के लोगों ने अयोध्या के श्रीराम मंदिर को भी लूटा है। ऐसे लुटेरों से भला क्या उम्मीद की जाए? मुंबई मनपा के पास ९० हजार करोड़ रुपए का फिक्स डिपॉजिट था, जो शिवसेना के शासनकाल में लगातार बढ़ता रहा। इन जमापूंजियों को भी अब उड़ा दिया गया। कुल मिलाकर, मुंबई महानगरपालिका का कामकाज अब चोर-उचक्कों के हाथों में चला गया है। शिवसेना के दौर में नगरसेवकों का अपने-अपने इलाकों में रसूख था, धमक थी। अब ‘नगरपिताओं का राज’ फिर से शुरू हो गया है और ‘खाते-पीते नगरपिता’ वाली नीति के तहत ठेकेदारों से मिलने वाले कमीशन के हिस्से बांटे जा रहे हैं। चेंबूर में एक स्कूली बच्चा और साकीनाका में एक ६० साल के बुजुर्ग की मौत, इसी ‘खाते-पीते’ नगरपिताओं की भेंट चढ़े हैं। अश्विनी भिड़े का इस्तीफा मांगने के बजाय, मनपा के राजनीतिक हुक्मरानों पर गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग पुरजोर तरीके से उठनी चाहिए। मुंबई मनपा पर अब नगरसेवकों का नहीं, बल्कि ठेकेदारों का राज कायम हो चुका है। शिवसेना के नाम पर छाती पीटने वाली ताकतों को अब तो मुंबई महानगरपालिका में शिवसेना की अहमियत समझ आ गई होगी। मुंबई मनपा पूरी तरह पंगु हो चुकी है, ठप पड़ गई है और मनपा के हर मैनहोल पर भ्रष्टाचार का बूच (ढक्कन) लगा हुआ है।

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