सना खान
रिया अब धीरे-धीरे बदल रही थी। बहुत समय बाद उसने फिर से हंसना शुरू किया था। ऑफिस में लोगों से बातें करने लगी थी। कभी-कभी काम करते हुए धीरे-धीरे गुनगुनाने भी लगी थी। उस रात जब उसने गाना गाया, तो उसकी आंखों में बहुत समय बाद सुकून दिखाई दिया। अक्षय दूर खड़ा बस उसे मुस्कुराकर देख रहा था। लेकिन दुनिया को किसी की खुशी ज्यादा देर तक कहां अच्छी लगती है। धीरे-धीरे ऑफिस में बातें शुरू होने लगीं। ‘आजकल बहुत खुश रहने लगी है’ ‘काम कम, बातें ज्यादा करती है।’ ‘इसको कोई टेंशन ही नहीं है शायद’ ‘पहले कितनी शांत थी’ रिया सब सुनती थी। पहले की तरह अब वो तुरंत टूटती नहीं थी, लेकिन कुछ शब्द आज भी उसके दिल तक पहुंच जाते थे। एक दिन वो चुपचाप अपनी सीट पर बैठी थी। अक्षय ने पूछा, `क्या हुआ?’ रिया हल्का-सा मुस्कुराई और बोली, ‘अजीब है न, जब मैं खामोश थी, तब लोगों को समस्या थी। अब मैं थोड़ा खुश रहने लगी हूं तो उससे भी समस्या है।’ कुछ पल के लिए अक्षय भी चुप हो गया। क्योंकि वो जानता था दुनिया अक्सर टूटे हुए इंसान को समझती नहीं और ठीक होते इंसान को स्वीकार नहीं करती। रिया खिड़की के बाहर देखते हुए बोली, ‘लोगों को सिर्फ वही पसंद आता है जो उनके हिसाब से जिए। अगर कोई इंसान अपने दर्द से बाहर आने लगे तो लोग उसे भी जज करने लगते हैं।’ उसकी आंखों में हल्की नमी थी। क्योंकि जिन लोगों ने उसकी खामोशी नहीं समझी थी, अब वही लोग उसकी मुस्कान पर सवाल उठा रहे थे।
अक्षय धीरे से बोला, ‘लोगों का काम बातें करना है, लेकिन तुम्हारा काम खुद को फिर से खोने नहीं देना।’ रिया उसकी तरफ देखती रही। शायद पहली बार उसे एहसास हो रहा था कि हर किसी को जवाब देना जरूरी नहीं होता। कुछ लड़ाइयां दुनिया से नहीं, अपने अंदर के डर से जीतनी पड़ती हैं। और उस दिन रिया ने तय कर लिया कि अब वो लोगों की सोच के हिसाब से नहीं, अपने सुकून के हिसाब से जिएगी। क्योंकि बहुत मुश्किल से उसने खुद को अंधेरे से बाहर निकाला था। अब वो फिर से दुनिया की बातों में खोना नहीं चाहती थी।
