मनमोहन सिंह
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और उनकी पत्नी जेनेट डी. रुबियो ने शनिवार को कोलकाता के मिशनरीज ऑफ चैरिटी का दौरा किया। साथ में अमेरिकी दूत सर्जियो गोर भी थे। सबने मिलकर मदर टेरेसा को याद किया, तस्वीरें खिंचवार्इं और दुनिया को संदेश दिया कि देखिए, हिंदुस्तान में सेवा और सद्भाव की वैâसी अविरल धारा बह रही है! वाह, क्या खूबसूरत और दिल को छू लेने वाला दृश्य था।
लेकिन ठहरिए! पर्दे के पीछे की कहानी थोड़ी ज्यादा ही ‘सस्पेंस’ भरी है। एक तरफ दिल्ली के गलियारों में एक बिल (एफसीआरए संशोधन) तैयार बैठा है, जिसका सीधा और सरल मकसद है, क्रिश्चियन संस्थाओं को विदेशों से मिलने वाली फूटी कौड़ी भी बंद करना और चर्च की संपत्तियों को सरकारी तिजोरी का रास्ता दिखाना! इसी विरोधाभास पर तृणमूल कांग्रेस के एक सांसद ने बीच में आकर सारा सस्पेंस खराब कर दिया और इसे घोर पाखंड का नाम दे दिया। सचमुच, यह तो वही बात हुई कि हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और। दुनिया को दिखाने के लिए तो मिशनरीज ऑफ चैरिटी का ये सेवाभावी चेहरा हाजिर है, लेकिन अंदरूनी नीति के लिए पीछे एफसीआरए का डंडा छुपाकर रखा गया है। घरेलू नीति कहती है कि इन संस्थाओं के वित्तीय हाथ-पैर बांध दिए जाएं, लेकिन विदेश नीति कहती है कि जब कोई बड़ा अमेरिकी अफसर आए, तो इन्हीं संस्थाओं को हिंदुस्तान का सॉफ्ट पावर बताकर चमकाया जाए। एक हाथ से कानून का शिकंजा कसना और दूसरे हाथ से विदेशी मेहमानों को चैरिटी की सैर कराना, इस अद्भुत मैनेजमेंट के लिए हमारे नीति-निर्माताओं को बेस्ट डायरेक्टर का अवॉर्ड तो मिलना ही चाहिए।
अब देखना यह है कि अगली बार जब कोई बड़े फिरंगी लीडरान आएंगे, तो उसे सैर करवाने के लिए ऐसी कोई संस्था बचेगी या तब तक सब जब्त हो चुका होगा! लेकिन अब सोचने की बात ये है कि यूएस सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के इस विजिट के कुछ पॉजिटिव अर्थ भी क्यों न निकाले जाएं!
