मुख्यपृष्ठस्तंभमहाराष्ट्रनामा : ‘भगवान के दरबार में पार्किंग पहले, जनता बाद में!’

महाराष्ट्रनामा : ‘भगवान के दरबार में पार्किंग पहले, जनता बाद में!’

राजन पारकर

शहर में अब विकास का नया मॉडल आया है- ‘जहां बच्चे खेलते हों, वहां गाड़ियां खड़ी करो!’ मंदिर के नाम पर मैदान निगलने की तैयारी चल रही है। कल तक जहां बच्चे क्रिकेट खेलते थे, बुजुर्ग टहलते थे, त्योहार मनते थे, अब वहां चमचमाती SUVs ध्यान लगाए खड़ी रहेंगी। नेताओं का तर्क बड़ा पवित्र है ‘भक्तों को सुविधा चाहिए!’ मानो भगवान ऊपर से कह रहे हों- ‘हे भक्तों, मोक्ष बाद में मिलेगा, पहले पार्किंग स्लिप कटवाओ!’ इस शहर में आदमी को घर नहीं मिलता, बच्चों को मैदान नहीं मिलता, लेकिन गाड़ियों को पांच मंजिला पार्किंग चाहिए! जनता सड़क पर उतरी तो सत्ता बोली-‘भावनाओं का सम्मान करेंगे’ यानी पहले बुलडोजर भेजो, बाद में संवेदना व्यक्त करो!
‘वडापाव पर वार और पूरी…मुंबई सरकार पर भारी!’
रेलवे वालों ने सोचा था- ‘थोड़ा किराया बढ़ाया, थोड़ा समोसा महंगा किया, जनता चुप रहेगी।’ लेकिन भूल गए कि मुंबईकर अपनी मोहब्बत छोड़ सकता है, वडापाव नहीं! जैसे ही दाम बढ़ाने की खबर आई, आम आदमी का रक्तचाप लोकल ट्रेन की स्पीड से ऊपर चला गया। कार्यालय में देर हो जाए चलेगा लेकिन वडापाव महंगा? यह सीधा आत्मसम्मान पर हमला है! फिर क्या था, रेलवे तुरंत बैकफुट पर आ गई। आदेश वापस। दर पुराने। चेहरे नए-नए शर्मिंदा। देश में चाहे बेरोजगारी बढ़ जाए, महंगाई आसमान छू ले लेकिन जिस दिन वडापाव महंगा होता है, उसी दिन असली लोकतंत्र जाग जाता है!
‘कुर्सी की राजनीति में रिश्ते भी किराए के!’
चुनाव आते ही नेताओं को अचानक सिद्धांत याद आने लगते हैं। कल तक जो गले मिल रहे थे, आज वही सीट के लिए ऐसे भिड़ रहे हैं जैसे शादी में आखिरी रसगुल्ले पर रिश्तेदार भिड़ते हैं। एक नेता बोले- ‘यह सीट हमारा अधिकार है!’ दूसरे बोले- ‘नहीं, यह हमारा सम्मान है!’ जनता सोच रही है- ‘साहब, कभी सड़क और पानी पर भी इतना प्रेम दिखा दीजिए!’ राजनीति अब विचारों की नहीं रही, यह अब ‘सीट पकड़ो प्रतियोगिता’ बन चुकी है। बैठकें हो रही हैं, मुलाकातें हो रही हैं, बयान दिए जा रहे हैं, मानो जनता ने नेता नहीं, टीवी सीरियल के कलाकार चुने हों। आज की राजनीति का सबसे बड़ा सिद्धांत यही है- ‘कुर्सी स्थायी है, विचारधारा अस्थायी!’

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