मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय :  रहे ना रहे हम...सात्विक सुरों का कारवां थम गया!

संपादकीय :  रहे ना रहे हम…सात्विक सुरों का कारवां थम गया!

मौसीकी और गायकी की दुनिया का बेहद कोमल और पाक सुर रविवार को हमेशा के लिए खामोश हो गया। आदरणीय सुमन कल्याणपुर जी के इंतकाल से तीन पीढ़ियों को मंत्रमुग्ध करनेवाली सुरीली और मखमली आवाज हमेशा के लिए सो गई है। सुमन ताई की आवाज क्या थी, मानो बेहद शीरीं, शफ्फाफ और रेशमी लिबास की तरह नर्म-ओ-मुलायम, सुरीली कायनात का कोई दैवीय तोहफा थी। उनकी आवाज शराफत और शालीनता का मुकम्मल लिबास थी। सुमन ताई ने कोई कम नहीं, बल्कि पूरे ७४० हिंदी फिल्मों के लिए अपनी आवाज का जादू बिखेरा। मोहम्मद रफी, मुकेश, तलत महमूद, किशोर कुमार और मन्ना डे जैसे उस दौर के तमाम सरताज गायकों के साथ उनके गाए गीत न सिर्फ पर्दे पर आए, बल्कि मकबूलियत के आसमान पर छा गए। मोहम्मद रफी साहब के साथ तो उन्होंने एक से बढ़कर एक, करीब १४० लाजवाब दोगाने गाए। ओ.पी. नैय्यर, नौशाद, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और हेमंत कुमार जैसे अजीम संगीतकारों के निर्देशन में उन्होंने अपनी कला को संवारा। सुमन ताई के वालिद शंकरराव हेमाडी, बांग्लादेश की राजधानी ढाका में सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया में एक आला अफसर थे। ढाका की सरजमीं पर ही सुमन ताई का जन्म हुआ, लेकिन वालिद के मुंबई तबादले ने मानो उनके मुकद्दर की राह ही बदल दी। मुंबई में शास्त्रीय संगीत की तालीम लेते हुए भी, सुरों से ज्यादा उनका रुझान चित्रकारी की तरफ था। इसी शगफ के चलते उन्होंने जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स में दाखिला लिया। मगर कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। इसी दरमियान एक महफिल में बतौर मुख्य अतिथि आए मखमली आवाज के मालिक तलत महमूद साहब ने जब उनका गाना सुना, तो वे इस कदर मुतास्सिर हुए कि उन्होंने फौरन एचएमवी कंपनी से सुमन ताई की सिफारिश कर दी। बस, यहीं से उनके फिल्मी सफर का आगाज हुआ। इसके बाद आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जबान पर, रहे न रहे हम महका करेंगे, मेरा प्यार भी तू है बहार भी तू है, ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे, तुमसे ओ हसीना कभी मोहब्बत न मैंने करनी थी, बहना ने भाई की कलाई से, जिंदगी इम्तिहान लेती है, न तुम हमें जानो न हम तुम्हें जानें और तुमने पुकारा और हम चले आए जैसे उनके न जाने
कितने सदाबहार नगमे
बेहद लोकप्रिय हुए। हिंदी के अलावा उन्होंने मराठी, बंगाली, उड़िया, कन्नड़, राजस्थानी, पंजाबी और भोजपुरी जैसी कई जबानों में अपनी आवाज का नजराना पेश किया। फिल्मी गीतों के साथ-साथ गजल, ठुमरी और भजनों में उनकी रूह बसती थी, लेकिन उनके दिल के सबसे करीब थे मराठी भावगीत। दशरथ पुजारी, वसंत प्रभु, अशोक पत्की, कमलाकर भागवत और विश्वनाथ मोरे जैसे दिग्गज मराठी संगीतकारों की धुन और सुमन ताई के सुरों के मिलन से कई अमर गीतों का जन्म हुआ। केतकीच्या बनी तिथे नाचला गं मोर, सांग कधी कळणार तुला भाव माझ्या मनातला, अरे संसार संसार, रिमझिम झरती श्रावणधारा, शब्द शब्द जपुनी ठेव, जिथे सागरा, मृदुल करांनी छेडीत तारा, देव माझा विठू सावळा और केशवा माधवा तुझ्या नामात रे गोडवा जैसे अनगिनत रूहानी गीत आज भी हवाओं में गूंजते हैं। उनका गाया लोरी गीत निंबोणीच्या झाडामागे चंद्र झोपला गं बाई तो महाराष्ट्र की हर मां के दिल का टुकड़ा बन गया। हैरत की बात यह है कि ये तमाम हिंदी-मराठी गीत उस दौर में मक़बूल हो रहे थे, जो हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग था। यह वह दौर था जब स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर जी की आवाज का जादू पूरी फिल्म इंडस्ट्री, संगीत जगत और संगीत प्रेमियों के दिलों पर सर चढ़कर बोल रहा था। ऐसे पुर-असर वलय के सामने एक बेहतरीन गायिका के रूप में अपनी अलहदा पहचान बनाना कोई मामूली बात नहीं थी। सुमन कल्याणपुर जी ने न सिर्फ यह पहचान बनाई, बल्कि ता-उम्र उसे बरकरार भी रखा। दिलचस्प बात यह है कि अपने पूरे कलात्मक सफर में उन्होंने कभी किसी से न तो रकाबत की और न ही अपनी तुलना की। अलबत्ता, मौसीकी के पारखी और आम सुननेवाले सुमन कल्याणपुर और लता मंगेशकर जी की आवाज की तुलना जरूर करते थे। आवाज की बुनावट,
सुरों का उतराव-चढ़ाव और सुरीली तानों
की हैरतअंगेज यकसानियत के कारण सुननेवाले अक्सर कशमकश में पड़ जाते थे कि यह आवाज लता दीदी की है या सुमन ताई की? बरसों बाद आज भी कई गानों को लेकर यह मुग़ालता बरकरार है। दोनों की गायकी का सबसे बड़ा साझा सिरा था उनकी आवाज की बेपनाह मिठास। इस तुलना को लेकर एक इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि आपकी आवाज़ लता मंगेशकर जैसी क्यों है तो सुमन ताई ने बेहद संजीदा और ख़ूबसूरत जवाब दिया था कि शायद हम दोनों एक ही वक्त खुदा के दरबार में गाने का गला मांगने गए थे। खुदा ने फिर हम दोनों में आधा-आधा सुर बांटकर, पहले लता दीदी को और फिर मुझे ज़मीन पर भेज दिया होगा। भले ही मुशाहिदीन यह तुलना करते रहे हों और उस दौर में अफवाहों का बाजार गर्म रहा हो, मगर सुमन ताई और लता दीदी के आपसी ताल्लुक़ात हमेशा बेहद शीरीं और पाकीजा रहे। हिंदी-मराठी सिनेमा और भावगीतों के इस सुरीले गुलदस्ते में सुमन कल्याणपुर जी ने जो योगदान दिया है, वह नस्ल-दर-नस्ल लोगों के दिलों को छूता रहेगा। पार्श्व गायन के साथ-साथ उन्होंने देश-विदेश में कई स्टेज शो भी किए, मगर जब वे कामयाबी के ओज पर थीं, तब अचानक एक मोड़ पर उन्होंने गायकी को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। छह दशकों के लंबे सफर में जो भी नगमे उनके हिस्से में आए, उन्होंने अपनी आवाज़ से उन्हें कुंदन बना दिया। शोहरत की चकाचौंध से हमेशा फासला रखनेवाली सुमन ताई अब हमसे बहुत दूर, उफुक के पार जा चुकी हैं। सुमन कल्याणपुर जी के रुखसत होने से फिल्म इंडस्ट्री का एक सात्विक, संजीदा और शालीन सुर खो गया है। चाहनेवालों के दिलों के तारों को झंकृत करनेवाली भावगीतों की यह मखमली मल्लिका, इस दुनिया की महफिल से अपनी भैरवी मुकम्मल कर, अब साक्षात मां सरस्वती के दरबार में सुरों की हाजिरी लगाने चली गई हैं!

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