डॉ. रवीन्द्र कुमार
यह तय पाया गया है कि तुरंत प्रभाव से पुलिस सुबह-सुबह पार्क के दरवाजे पर खड़ी रहा करेगी और हर वॉक करने आने वाले व्यक्ति का “गुड मॉर्निंग” कहकर अभिवादन करेगी, ताकि उनमें विश्वास और समाज में सुरक्षा का भाव पैदा किया जा सके। यह सुनकर नागरिकों में, खासकर मॉर्निंग वॉकर्स में, एक अजीब-सा भय व्याप्त हो गया है। कई लोगों ने तो मॉर्निंग वॉक पर जाना ही छोड़ दिया है। पता चला कि अब उन्हें डर है कि उनकी घड़ी, मोबाइल या वॉलेट कोई छीने न छीने, पुलिस जरूर छीन लेगी। फिर वही थाने की मॉर्निंग वॉक करनी पड़ेगी। उनके दर्जनों सवालों के जवाब देने होंगे और बार-बार थाने के चक्कर लगाने पड़ेंगे। इससे अच्छा है कि जब पुलिस पार्क से कहीं और डिप्लॉय होगी, तब वॉक कर लेंगे। टांगें सलामत रहें, वॉक बहुत हैं।
पुलिस वाले भी नित नई योजनाएं बनाते रहते हैं कि आम जनता को कैसे छकाया जाए और कैसे दोनों ओर से कमाई की जा सके। मोबाइल और चेन छीनने वालों से भी और इन ‘हेल्थ-कॉन्शस’ नागरिकों से भी। नागरिक भी सोचने लग पड़ेंगे कि यार, हेल्थ तो बाद में भी देख ली जाएगी, पहले अपनी जान-माल की सुरक्षा करो—मोटरसाइकिल गैंग से भी और पुलिस की वैन से भी।
अब अगर पुलिस रोज-रोज गुड मॉर्निंग करने लगेगी, तो वह चिन्हित कर लेगी कि किसे किस केस में फंसाना है। किस पर क्या केस ठोका जाए, ताकि जो मांगो वह चुपचाप दे जाए और देने के बाद चुप्पी साधे रखे। यह एक तरह से उनका ‘फील्ड वर्क’ है। प्रोजेक्ट वर्क, यू नो!
धीरे-धीरे हाल यह हो जाएगा कि लोग गुड मॉर्निंग सुनते ही कांपने लगेंगे। नर्वस हो जाएंगे। गुड मॉर्निंग का जवाब गुड मॉर्निंग ही हुआ करता है। गुड मॉर्निंग का जवाब गुड बाय नहीं होता और न ही गुड नाइट। आप एक बार कहकर तो देखिए, बच्चू! कहीं गुड नाइट हवालात में न गुजारनी पड़े। वह गाना है न—
ज़िंदगी भर न भूलेगी वो हवालात की रात…
एक दृश्य का मुलाहिजा कीजिए—
एक शांतिप्रिय दब्बू नागरिक (अब नागरिक है तो शांतिप्रिय है और शांतिप्रिय है तो दब्बू तो होगा ही) जैसे ही पार्क के गेट से अंदर घुसने को हुआ, पुलिस की रौबीली आवाज आई—
“अरे भई! इत्त भी सुन ले। कहां दौड़ा जा रहा है? कोई कांड करके आया है के? तन्ने घणी जल्दी मची है! ये पांच फुट आठ इंच का आदमी तन्ने दिखे कोई ना? सरकार ने हमारी भी कोई ड्यूटी लगा राखी है। तन्ने बेरा कोई ना?”
मॉर्निंग वॉकर डरते-डरते हाथ जोड़कर बोला, “नमस्ते दरोगा साब।”
(वह इतना नर्वस हो चुका है कि हाथ जोड़े रहा और कांस्टेबल को दरोगा जी कहने लगा।)
कांस्टेबल बोला, “अरे नमस्ते तो ठीक है, हमारी भी तो गुड मॉर्निंग लेता जा। के हमारी गुड मॉर्निंग तन्ने पसंद कोई ना आई?”
अब मॉर्निंग वॉकर वाकई भयभीत हो गया।
“सुन, तन्ने कोई संदिग्ध-सा आदमी नजर आए तो मन्ने बताना। आखिर हम तेरी सुरक्षा को ही यहां मुंह-अंधेरे तड़के से खड़े हैं। कसम ले ले, न कोई चाय पी है, न कोई नाश्ता नसीब हुआ।”
मॉर्निंग वॉकर ने जेब से सौ रुपये का नोट निकाला और बोला, “हुजूर, आज तो पॉकेट में इतने ही हैं। आप चाय पी लेना।”
“क्यूं, तू न पीएगा?”
“नहीं साब, मुझे शुगर है। डॉक्टर ने मना कर रखा है।”
“फेर ठीक है।”
इस प्रकार देखते-देखते पार्क मॉर्निंग वॉकर्स-विहीन हो गया। अब जमीन तैयार थी। भले उस पर कब्जा करो, प्लॉट काटो या रातों-रात बिल्डिंग खड़ी कर दो। महीने भर में या तो मॉर्निंग वॉकर्स पार्क में आना बंद कर देंगे या फिर अपनी छतों और सोसायटियों में ही वॉक करने लग पड़ेंगे। आखिर हेल्थ इज़ वेल्थ।
अब वे किसी को भी गुड मॉर्निंग नहीं बोलते। उनके मुंह से या तो “जय श्रीराम” निकलता है, “राम-राम सा” निकलता है या फिर “प्रणाम”। उन्हें पता है कि पुलिस की यह गुड मॉर्निंग बहुत दुख देती है। यह गुड मॉर्निंग पुलिस के लिए ही गुड मॉर्निंग है, उनके लिए नहीं।
