सना खान
सबसे बड़ा झूठ जो लोग खुद से बोलते हैं
‘मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।’
आरव ने यह बात मुस्कुराते हुए कही, लेकिन उसकी आंखें उसका साथ नहीं दे रही थीं। दोस्त की शादी में किसी ने उस लड़की का नाम ले लिया, जिससे वह कभी बेहद प्यार करता था। उसने तुरंत जवाब दिया, ‘वह अपनी जिंदगी में खुश है, मैं अपनी ज़िंदगी में। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। ‘बात वहीं खत्म हो गई। लेकिन उसी रात उसने अपने फोन में पुरानी तस्वीरें देखीं। एक वीडियो सामने आया। बारिश का दिन था और वह लड़की खिलखिलाकर हंस रही थी। आरव कुछ पल तक स्क्रीन को देखता रहा और फिर फोन बंद कर दिया। उसने खुद से कहा, ‘अब इन सब बातों का क्या मतलब? ‘लेकिन सच यह है कि अगर किसी बात से सचमुच फर्क नहीं पड़ता, तो हम उसे बार-बार याद नहीं करते। हम सभी ने कभी न कभी यह झूठ खुद से बोला है— ‘मुझे फर्क नहीं पड़ता। ‘जब कोई अपना बदल जाता है, जब कोई रिश्ता टूट जाता है, जब हमारी उम्मीदें टूटती हैं या जब हमारी मेहनत की कद्र नहीं होती। कई बार ‘मुझे फर्क नहीं पड़ता’ एक जवाब नहीं, एक बचाव होता है। एक ऐसा बचाव, जो हम दुनिया से नहीं, अपने टूटे हुए दिल से करते हैं। क्योंकि कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिन्हें स्वीकार करने के लिए जितनी हिम्मत चाहिए, उतनी उन्हें छिपाने के लिए नहीं। समाज ने हमें मजबूत दिखना सिखाया है। रोना नहीं, कमजोरी नहीं दिखानी और दिल की बात हर किसी से नहीं कहनी। लेकिन दबे हुए जज्बात कहीं जाते नहीं। वे हमारे भीतर रहते हैं। कभी किसी पुराने गाने में, कभी किसी तस्वीर में और कभी किसी ऐसे नाम में, जिसे सुनकर हम आज भी कुछ पल के लिए चुप हो जाते हैं। उस रात सोने से पहले आरव ने आखिरी बार फोन उठाया। उसने उस लड़की की प्रोफाइल खोली। तस्वीर में वह मुस्कुरा रही थी। कुछ सेकंड तक वह स्क्रीन को देखता रहा।
फिर उसने धीरे से फोन बंद कर दिया। पहली बार उसने खुद से झूठ नहीं बोला। उसे आज भी फर्क पड़ता था। उसे उस लड़की की कमी नहीं खल रही थी, बल्कि उस इंसान की, जो वह उसके साथ हुआ करता था। हम जीवन में बहुत से झूठ सुनते हैं, लेकिन सबसे खतरनाक झूठ वह होता है, जो हम खुद से बोलते हैं। क्योंकि जिस दर्द को हम स्वीकार नहीं करते, वह खत्म नहीं होता, वह बस हमारे भीतर जगह बना लेता है। जिस बात पर हम कहते हैं कि फर्फ नहीं पड़ता, अक्सर वही बात सबसे ज्यादा फर्क डालती है। कह दिया हमने कि अब कोई असर नहीं होता, तेरे जाने का दिल पर कोई सफर नहीं होता। मगर सच यह है कि कुछ जख्म दिखते नहीं और हर दर्द का जिक्र हर पहर नहीं होता। सबसे बड़ा झूठ यही है – ‘मुझे फर्क नहीं पड़ता’, वरना जो दिल में न हो, उसका इतना असर नहीं होता।
