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विशेष :  बिना अर्थ की आर्थिक नीति… विकास के आंकड़ों में पिसती आम जनता

डॉ. मंगेश आमले

आज देश के किसी भी मध्यमवर्गीय या गरीब परिवार के सुबह की शुरुआत ‘विकास के दावों’ से नहीं, बल्कि दूध, गैस सिलेंडर, पेट्रोल और बच्चों की स्कूल फीस के बढ़े हुए खर्चों की चिंता से होती है। बीते कुछ वर्षों में आम जनता की आय भले ही जस की तस रही हो, लेकिन रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतें दोगुनी हो चुकी हैं। आंकड़ों के मायाजाल में उलझी सरकार यह समझने में नाकाम रही है कि देश की तरक्की केवल बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति की थाली और उसकी जेब की मजबूती से मापी जाती है। सरकार की आर्थिक नीतियां केवल कॉरपोरेट बैलेंस शीट और जीडीपी के आंकड़ों को सुधारने में सफल रही हैं, लेकिन वे आम नागरिक के जीवन को सुरक्षा देने में पूरी तरह विफल साबित हुई हैं। यही कारण है कि आज देश की आर्थिक नीति ‘बिना अर्थ की नीति’ नजर आने लगी है।
टूटता घरेलू बजट
सरकार भले ही वैश्विक मंचों पर देश की आर्थिक प्रगति का ढिंढोरा पीटे, लेकिन हकीकत यह है कि आज देश का सबसे बड़ा संकट महंगाई है। पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की आसमान छूती कीमतों ने पूरे देश का बजट बिगाड़ दिया है। र्इंधन पर लगाए गए भारी-भरकम करों ने माल ढुलाई और परिवहन लागत को इतना बढ़ा दिया है कि बाजार में पहुंचने वाली हर आवश्यक वस्तु महंगी हो गई है। खाद्य तेल, दालें, दूध और रोजमर्रा की सब्जियां अब आम इंसान की पहुंच से दूर हो रही हैं। वैश्विक परिस्थितियों और अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों का बहाना बनाकर सरकार अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकती। जब आय स्थिर हो और खर्च बढ़ रहे हों तो मध्यम वर्ग, किसान, मजदूर और नौकरीपेशा वर्ग पर पड़नेवाला आर्थिक दबाव उन्हें कर्ज के जाल में धकेल देता है।
निजी निवेश का संकट
आर्थिक मोर्चे पर सरकार की विफलताओं का एक बड़ा कारण प्रतिकूल और दमनकारी नियामक माहौल है। देश की प्रमुख नियामक और जांच एजेंसियों के कथित राजनीतिक दुरुपयोग और सख्त नियमों के डर से घरेलू उद्योगों में असमंजस का माहौल है। इसके परिणामस्वरूप देश में निजी निवेश लगभग थम-सा गया है।
पूंजी का पलायन इस संकट को और गंभीर बना रहा है। वर्ष २०२५-२६ के आंकड़े बताते हैं कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेश ऋणात्मक (माइनस ४.३ अरब डॉलर) हो चुका है यानी विदेशी निवेशक भारत से लगातार अपना पैसा निकाल रहे हैं। भारतीय बाजारों पर घटते भरोसे के कारण लोग अब सोने की ओर भाग रहे हैं, जिससे सोने का आयात बढ़कर ७२ अरब डॉलर के पार पहुंच गया है। अमेरिकी-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष से ब्रेंट क्रूड ऑयल १०७ डॉलर प्रति बैरल के करीब है, जिसने भारतीय रुपए को डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तर पर ला दिया है। आधिकारिक थोक मूल्य सूचकांक महंगाई का ८.३ प्रतिशत पर पहुंचना यह साफ करता है कि जमीन पर संकट गहरा है।
ग्रामीण संकट
एक तरफ जहां शहरी मध्यम वर्ग महंगाई से त्रस्त है, वहीं ग्रामीण भारत रोजगार के गंभीर संकट से जूझ रहा है। गरीबों के लिए जीवनदान मानी जानेवाली मनरेगा जैसी योजनाओं को कमजोर किया गया है, जिससे ग्रामीण इलाकों में मजदूरी और रोजगार के अवसर घटे हैं। इसके साथ ही, किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य न मिलना और खेती की बढ़ती लागत ने कृषि क्षेत्र को हाशिए पर धकेल दिया है। सरकार की नीतियां बड़े कॉरपोरेट घरानों को करों में छूट और रियायतें देने में जितनी तत्पर दिखती हैं, उतनी संवेदनशीलता समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए नहीं दिखाई देती।
कथनी और करनी का अंतर
हाल ही में र्इंधन, खाद और सोने की खपत कम करने और जनता से ‘त्याग’ करने की जो अपील की गई, वह यह साबित करने के लिए काफी है कि मंत्रालयों के स्तर पर आर्थिक प्रबंधन पूरी तरह विफल रहा है।
एक तरफ जनता से बचत करने और उपभोग कम करने को कहा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी स्तर पर भव्य आयोजनों और रैलियों का सिलसिला थमता नहीं दिखता।
यदि सरकार वास्तव में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना चाहती है तो उसे अपनी बाजार-विरोधी और दमनकारी नीतियों में आमूलचूल बदलाव करना होगा। सबसे पहले आर्थिक नीतियों के संचालन के लिए राजनीतिक वफादारी के बजाय स्वतंत्र, बाजार-अनुकूल और योग्य आर्थिक विशेषज्ञों को जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए। इसके साथ ही, र्इंधन और आवश्यक वस्तुओं पर टैक्स के बोझ को तुरंत कम किया जाना चाहिए ताकि बाजार में मांग और आम जनता की क्रय शक्ति बढ़ सके। अंत में, जांच एजेंसियों और नियामक तंत्र की भूमिका को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाना होगा, ताकि विदेशी और घरेलू निवेशक बिना किसी डर के भारत में निवेश कर सकें।
देश की प्रगति केवल बड़ी-बड़ी इमारतों, एक्सप्रेसवे या जीडीपी के ऊंचे आंकड़ों से नहीं मापी जा सकती। वास्तविक विकास वह है जिसका लाभ देश के हर परिवार तक पहुंचे। जब तक सरकार अपनी नीतियों का रुख कॉरपोरेट-क्रेंद्रित से हटाकर जन-केंद्रित नहीं करेगी, तब तक यह आर्थिक विकास आम नागरिक के लिए बेमानी और ‘बिना अर्थ की नीति’ ही बना रहेगा। आज समय की मांग है कि सरकार आंकड़ों के मायाजाल से बाहर निकलकर जनता को महंगाई और बेरोजगारी से वास्तविक राहत दे।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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