-बगावत का सैलून और नेताओं की उधड़ी हुई विग!
राजन पारकर
भारतीय राजनीति का दृश्य इन दिनों किसी गंभीर लोकतांत्रिक व्यवस्था कम और घूमता हुआ सर्कस ज्यादा दिखाई दे रहा है। एक तरफ नाशिक में सत्ता पक्ष के दो-दो संकटमोचक मैदान में उतरे, लेकिन बगावत का बुखार उतारने में असफल रहे। दूसरी तरफ जनता के सिर के बाल काटने से पहले उसकी जेब काटने की नई व्यवस्था लागू हो गई। और उधर दक्षिण भारत में भाजपा का ऐसा हाल है कि मानो पार्टी कार्यालय के बाहर इस्तीफा जमा करने के लिए अलग खिड़की खोलनी पड़े!
नासिक : संकटमोचक लौटे, संकट वहीं खड़ा रहा!
नासिक में महायुति के महारथी यह मानकर पहुंचे थे कि उनका नाम सुनते ही बागी उम्मीदवार चरणों में गिर पड़ेगा। लेकिन लोकतंत्र ने फिर साबित कर दिया कि हर आदमी रिमोट कंट्रोल से नहीं चलता। दो-दो बड़े नेता पहुंचे, घंटों समझाइश हुई, राजनीतिक प्रसाद बांटे गए, भविष्य के सपने दिखाए गए, लेकिन बागी महाशय टस से मस नहीं हुए। अब हालत यह है कि अधिकृत उम्मीदवार से ज्यादा चर्चा बागी उम्मीदवार की हो रही है। राजनीति में यह वही स्थिति होती है जब बारात दूल्हे की हो और चर्चा घोड़ी की होने लगे। सवाल यह नहीं कि बागी क्यों नहीं माने। सवाल यह है कि सत्ता में रहते हुए भी अगर लोग मानने को तैयार नहीं हैं तो फिर सत्ता का प्रभाव आखिर बचा कितना है?
अब बाल कटवाने से पहले बैंक बैलेंस देखिए!
जनता पहले ही रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल, स्कूल फीस, बिजली बिल और सब्जियों के हमलों से घायल थी। अब नाई समाज ने भी घोषणा कर दी है कि ‘जब पूरी दुनिया महंगी हो रही है तो हम ही संत क्यों बने रहें?’ अब बाल कटवाना भी एक आर्थिक निर्णय बन गया है। कल तक आदमी सोचता था कि महीने में एक बार बाल कटवा लेंगे। अब सोचेगा कि बाल कटवाऊं या बच्चों की स्कूल फीस भरूं? महंगाई का यह स्तर देखकर लगता है कि भविष्य में लोग पुराने फोटो देखकर याद करेंगे कि ‘भाई, यह वह दौर था जब हम नियमित रूप से हेयरकट करवाया करते थे!’ सरकार कहती है कि अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है। जनता पूछ रही है कि मजबूत अर्थव्यवस्था आखिर है कहां? क्योंकि मजबूत तो केवल बिल दिखाई दे रहे हैं।
दक्षिण में भाजपा : अण्णामलाई गए, समर्थक भी साथ ले गए!
राजनीति में कई नेता आते हैं और जाते हैं। लेकिन कुछ नेता ऐसे होते हैं जो जाते समय पार्टी का फर्नीचर भी साथ ले जाते हैं। तमिलनाडु में कुछ वैसा ही दृश्य दिखाई दे रहा है। एक नेता ने इस्तीफा दिया और उसके बाद इस्तीफों की ऐसी बरसात शुरू हुई कि पार्टी कार्यालय में शायद इस्तीफा गिनने के लिए अलग कर्मचारी नियुक्त करना पड़े। नेताओं के जाने से ज्यादा चिंता की बात यह है कि कार्यकर्ता भी कतार बनाकर बाहर निकल रहे हैं। राजनीति में इसे संगठनात्मक संकट कहते हैं। साधारण भाषा में इसे कहते हैं ‘जहाज अभी डूबा नहीं है, लेकिन यात्री लाइफ जैकेट पहन चुके हैं।’ भाजपा वर्षों से दक्षिण में अपनी जमीन मजबूत करने का सपना देख रही थी। लेकिन अब हालत यह है कि जमीन मजबूत होने के बजाय कुर्सियों के पेंच ढीले होते दिखाई दे रहे हैं। नासिक में संकटमोचक संकट नहीं सुलझा पाए। महंगाई ने जनता के बाल खड़े कर दिए और दक्षिण में नेताओं ने पार्टी के भीतर ही राजनीतिक मुंडन शुरू कर दिया। जनता यह सब देखकर मुस्कुरा रही है और सोच रही ‘लोकतंत्र सचमुच महान है। यहां कभी नेता जनता को बनाते हैं, कभी जनता नेताओं को बनाती है और कभी-कभी नेता खुद ही अपना मजाक बना लेते हैं!’
