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संपादकीय : सालभर में शून्य रोजगार… जरा आईने में देखिए!

मौजूदा वैश्विक अस्थिरता के इस दौर में भी भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था और औद्योगिक विकास को कैसे मजबूत बनाए रखा है, इस बात का ढिंढोरा केंद्र सरकार और उसके समर्थक उठते-बैठते पीटते रहते हैं। लेकिन अब सरकार द्वारा ही दी गई जानकारी ने इन दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। पिछले एक साल में देश में रोजगार में एक पैसे का भी इजाफा नहीं हुआ है। सरकार के सांख्यिकी मंत्रालय ने संसद में सोमवार को बताया कि सालभर में देश में रोजगार के अवसर न तो बढ़े हैं और न घटे हैं। इस मंत्रालय के `पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे’ के मुताबिक, देश के `जॉब मार्केट’ की स्थिति ‘जस की तस’ है। चालू तिमाही में बेरोजगारी की दर ५.५ प्रतिशत रही है। सालभर पहले यह ५.६ प्रतिशत थी। जून महीने में नौकरीपेशा लोगों का अनुपात ५१.४ प्रतिशत था, जो बीते जून में ५१.२ प्रतिशत था। यानी नौकरीपेशा लोगों की संख्या में बेहद मामूली सी बढ़ोतरी हुई है। महिला कामगारों का अनुपात भी ३२ प्रतिशत से बढ़कर बमुश्किल ३२.७ प्रतिशत तक ही पहुंच पाया है। ग्रामीण रोजगार के अवसर तो कम ही हुए हैं। सरकार के रोजगार पैदा करने के दावों की इस जानकारी ने
हवा निकाल दी हो
फिर भी बेरोजगारी बढ़ी नहीं है, यही ज्यादा अहम बात है, ऐसा उल्टा राग अलापने में भी हुक्मरान कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। देश में स्नातक युवाओं की संख्या अब ६३ मिलियन (६.३ करोड़) है। चार दशकों में यह संख्या १३ गुना बढ़ गई है। उसी समय बिना नौकरी वाले स्नातक युवाओं की संख्या १६ गुना बढ़ गई है। आज दस में से छह स्नातक युवा बेरोजगार हैं। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, आज भी हर तीन बेरोजगार युवाओं में से दो के पास डिग्री है। यानी नौकरी की योग्यता तो है, लेकिन रोजगार नहीं है। देश के युवाओं की फिलहाल ऐसी खौफनाक हालत है। मोदी सरकार की तरक्की के दावे अगर सच हैं, तो फिर पिछले एक साल में आप एक भी नया रोजगार क्यों नहीं पैदा कर सके? नौकरी के इंतजार में बैठे युवाओं की संख्या तेजी से क्यों बढ़ रही है? मोदी के हर साल दो करोड़ रोजगार देने के एलान का गुब्बारा क्यों फूट गया? एक हजार युवाओं में से सिर्फ १२ लोगों को ही पक्की नौकरी क्यों मिल रही है? स्नातक महिलाओं की बेरोजगारी क्यों बढ़ रही है? इन सवालों के जवाब सरकार द्वारा ही संसद में दिए गए आंकड़ों में छिपे हुए हैं। महज चार दिन पहले केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मंडाविया ने मोदी सरकार द्वारा
बारह साल के शासनकाल में
हर साल १.७ करोड़ नए रोजगार पैदा करने का ढिंढोरा पीटा था। अब मोदी सरकार के ही सांख्यिकी मंत्रालय ने पिछले एक साल में एक भी रोजगार पैदा न होने की बात संसद में ही बताकर इस ढोल को फोड़ दिया। प्रयागराज में `छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में बेरोजगारी को लेकर देश के युवाओं के भविष्य पर चिंता जताने वाले राहुल गांधी को भाजपा वालों ने निशाना बनाया था। अब उनकी ही सरकार ने राहुल गांधी की चिंता को सच साबित कर दिया है। विपक्ष से डरकर मोदी-शाह संसद से तो गायब हैं ही, लेकिन इन लोगों ने अब देश से विकास और रोजगार भी गायब कर दिया है। `पांच ट्रिलियन’ अर्थव्यवस्था की डींगें हांकने वाली सरकार सालभर में एक भी नया रोजगार पैदा नहीं कर सकी है। यह मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों का `आईना’ है और यह उनके ही एक मंत्रालय ने दिखाया है। `रोजगार न हो तो पकौड़े तलो’ कहने वाले देश के गृह मंत्री और `जंतर-मंतर’ के आंदोलन से डरकर देश के युवाओं को संबोधित करते हुए `हेलो फ्रेंड्स’ जैसी रील बनाने वाले प्रधानमंत्री को जरा इस आईने में खुद को देखना चाहिए।

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