मुख्यपृष्ठसमाचारजंग-ए-आजादी में उलमा-ए-सादिकपुर की अजीम कुर्बानियां- मोहम्मद राशिद अहमद, संपादक, संगम उर्दू

जंग-ए-आजादी में उलमा-ए-सादिकपुर की अजीम कुर्बानियां- मोहम्मद राशिद अहमद, संपादक, संगम उर्दू

अनिल मिश्र / पटना

भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल बंदूकों और नारों तक सीमित नहीं था; इसके पीछे सोच, रणनीति और बेमिसाल कुर्बानियों का एक लंबा इतिहास रहा है। जब 1857 की क्रांति और उससे पहले ही अंग्रेजी हुकूमत देश में अपने पैर जमा रही थी, उस वक्त बिहार की सरजमीन, विशेषकर पटना का सादिकपुर, आजादी की लड़ाई का एक बड़ा वैचारिक और रणनीतिक केंद्र बनकर उभरा। सादिकपुर के उलमा (विद्वानों) ने न केवल कलाम और तकरीर से अंग्रेजों के खिलाफ अलख जगाई, बल्कि अपने जान-माल और परिवारों की बाजी लगाकर जंग-ए-आजादी की एक स्वर्णिम इबारत लिखी।
वहाबी आंदोलन और सादिकपुर का केंद्र
19वीं सदी की शुरुआत में शुरू हुए वहाबी आंदोलन (जिसे भारत में तहरीक-ए-मुजाहिदीन भी कहा जाता है) का मुख्य उद्देश्य भारत से ब्रिटिश हुकूमत का खात्मा करना था। शाह वलीउल्लाह देहलवी और सैयद अहमद शहीद के विचारों से प्रभावित होकर पटना के सादिकपुर के उलमा ने इस आंदोलन की कमान संभाली।
सादिकपुर का यह घराना केवल धार्मिक विद्वानों का केंद्र नहीं था, बल्कि यह पूरे भारत में अंग्रेजों के खिलाफ गुप्त अभियानों, वित्तीय सहायता और जासूसों व रसद को सरहद (उत्तर-पश्चिम सीमांत) तक पहुंचाने का मुख्यालय बन गया था।
मौलाना विलायत अली और मौलाना इनायत अली
सादिकपुर के इन दो भाइयों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जोरदार संघर्ष किया। मौलाना विलायत अली ने भारत के कोने-कोने में भ्रमण करके अंग्रेजों के खिलाफ जन-जागरण अभियान चलाया। उन्होंने लोगों को संगठित किया और अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विरोध की नींव रखी। उनके इंतकाल के बाद मौलाना इनायत अली ने आंदोलन का नेतृत्व संभाला और अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया।
मौलाना अहमदुल्लाह सादिकपुरी
सादिकपुर के इस परिवार के सबसे प्रमुख स्तंभों में से एक मौलाना अहमदुल्लाह थे। अंग्रेज प्रशासन को जब सादिकपुर की गतिविधियों का सुराग मिला, तो मौलाना अहमदुल्लाह को गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर अंग्रेजी सरकार के खिलाफ बगावत और बागियों की आर्थिक मदद करने का मुकदमा चलाया गया।
मौलाना याह्या अली और मौलाना अब्दुल रहीम
इन उलमा ने आंदोलन को गुप्त रूप से जीवित रखने में बड़ी भूमिका निभाई। अंग्रेजों ने इन्हें गिरफ्तार करके अंडमान-निकोबार (काला पानी) की जेलों में भेज दिया, जहां इन्होंने ताउम्र अमानवीय यातनाएं सहीं।
अंबाला और पटना मुकदमे (1863-1865)
अंग्रेज सरकार सादिकपुर के उलमा के प्रभाव से थर्रा गई थी। 1860 के दशक में अंग्रेजों ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए अंबाला केस (1863) और पटना मुकदमा (1865) चलाए।
इन मुकदमों में सादिकपुर के कई प्रमुख उलमा को फांसी और आजीवन कारावास (काला पानी) की सजा सुनाई गई। अंग्रेजों ने मौलाना अहमदुल्लाह और मौलाना याह्या अली समेत अन्य उलमा की संपत्ति जब्त कर ली।
सादिकपुर के उलमा के हौसले इतने बुलंद थे कि जेल और फांसी भी उन्हें झुका न सकी। इससे बौखलाकर अंग्रेजों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं।
अंग्रेजी हुकूमत ने सादिकपुर में स्थित इन विद्वानों के पूरे मोहल्ले और हवेली को तोप और बुलडोजर (हल) से जमींदोज कर दिया।
अंग्रेजों का गुस्सा इतना भयानक था कि उन्होंने सादिकपुर के उलमा के बुजुर्गों की कब्रों तक को खोदकर नष्ट कर दिया, ताकि उनका नामो-निशान तक मिट जाए।
जिस जगह सादिकपुर के विद्वानों के घर हुआ करते थे, अंग्रेजों ने उसे पूरी तरह साफ करके वहां पटना नगर निगम का एक पार्क (सादिकपुर पार्क/अस्पताल क्षेत्र) बनवा दिया।
सादिकपुर के उलमा की कुर्बानी इस बात का जीता-जागता सबूत है कि भारत की आजादी किसी एक वर्ग या समुदाय की बदौलत नहीं आई, बल्कि इसमें उलमा-ए-हिंद और बिहार की पावन धरती का बहुत बड़ा खून-पसीना शामिल है। सादिकपुर के उलमा ने अपनी धन-दौलत, अपने घर-बार और अपनी जानें देश की आजादी पर न्योछावर कर दीं, लेकिन अंग्रेजों के सामने घुटने नहीं टेके।
आज सादिकपुर की वह पावन मिट्टी हमें याद दिलाती है कि देश की आजादी की नींव में कितने अनाम और महान शूरवीरों का खून समाया हुआ है। उलमा-ए-सादिकपुर का यह ईसार और जज्बा इतिहास के पन्नों में हमेशा अमर रहेगा।

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