राज्य में जनता को ठगने का खेल पूरे शबाब पर है। पहले हुक्मरानों ने सूबे की बहनों को चूना लगाया। विधानसभा चुनाव जीतते ही नई-नई शर्तें थोपकर लाखों लाडली बहनों को योजना से बाहर का रास्ता दिखा दिया। अब यही तरकीब उन्होंने कर्जदार किसानों पर भी आजमाई है। सरकार ने बड़े गाजे-बाजे और राणाभीमदेवी वाले रौब के साथ ‘पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होलकर किसान कर्जमुक्ति योजना’ का एलान किया था। ढोल पीटा गया कि किसानों का दो लाख रुपए तक का कर्ज माफ होगा। लेकिन लीजिए, इस दावे का गुब्बारा भी फूट गया। सरकार का कहना है कि इस योजना से ५५ लाख किसानों को फायदा होगा और उनका करीब ३५ हजार ५८५ करोड़ रुपए का फसल कर्ज माफ कर दिया जाएगा। चलो, सरकार की बात मानकर एक पल को यह तसल्ली कर भी लें कि ५५ लाख किसानों को राहत मिलेगी, लेकिन महाराष्ट्र के बाकी बचे लाखों कर्जदार किसानों का क्या? सरकार ने योजना के नाम पर जो पेचीदा और उलझाऊ शर्तें थोपी हैं, उनका क्या? इन शर्तों की लक्ष्मण रेखा के बाहर छूटे किसानों के बारे में कौन सोचेगा? कोई यह नहीं कहता कि अपात्र किसानों को कर्ज माफी का रेवड़ी-प्रसाद बांट दो, लेकिन अगर सरकार खुद ही इन शर्तों की आड़ लेकर अपना पैसा बचाने का खेल खेल रही हो, तो मामला बेहद गंभीर हो जाता है। सरकारी अधिकारी बताते हैं कि अपात्रता के थोपे गए नियमों से सरकारी तिजोरी पर किसानों के
कर्ज माफी का भार
कितना कम पड़ेगा और कर्ज माफी के नगाड़े बजाने वाले हुक्मरान अब इस पर मुंह में दही जमाकर बैठे हैं। मूल रूप से अपात्रता के जानबूझकर थोपे गए इन नियमों के चलते राज्य के ५० फीसदी से ज्यादा किसान ‘पुणे श्लोक अहिल्यादेवी होलकर शेतकरी कर्ज मुक्ति योजना’ के लाभ से महरूम रह जाएंगे। यह योजना सिर्फ १ अप्रैल २०१९ से ३१ मार्च २०२५ के बीच लिए गए फसल कर्ज और पुनर्गठित कर्ज तक ही मर्यादित है। नतीजा यह कि खेती के औजार या मवेशी खरीदने के लिए कर्ज लेनेवाले लाखों किसान तो खुद-ब-खुद इस कर्ज माफी से बाहर फेंक दिए गए हैं। इसके अलावा, महाविकास आघाड़ी सरकार के वक्त २०१९ में जिन किसानों ने ‘महात्मा ज्योतिबा फुले कर्ज माफी’ योजना का फायदा उठाया था, उन्हें भी इस नई योजना का पूरा लाभ नहीं मिलेगा। ऐसे ३२ लाख से ज्यादा किसानों को सरकार ने महज ५० हजार रुपए का ‘प्रोत्साहन भत्ता’ थमाकर टरका दिया है। अगर प्रोत्साहन ही देना था तो रकम कम से कम एक लाख तो रखते! ऊपर से इसमें भी दो साल की ऐसी शर्त जड़ दी कि यहां भी लाखों किसान ‘अपात्र’ हो जाएं, सरकार ने इसका पूरा बंदोबस्त कर रखा है। हैरत की बात है कि इस नई कर्ज माफी में उन अभागे किसानों के
आर्थिक रूप से दुर्बल
वारिसों और विधवा पत्नियों के बारे में सोचने की जहमत तक नहीं उठाई गई, जिन्होंने तंगहाली में खुदकुशी कर ली। सूबे के हुक्मरानों ने विधानसभा चुनाव में किसानों से मुकम्मल कर्ज माफी का वादा किया था। लाडली बहनों को भी १,५०० रुपए के बजाय २,१०० रुपए महीना देने का सब्जबाग दिखाया था। लेकिन सत्ता में आते ही २,१०० रुपए तो दूर, उल्टा ‘ई-केवाईसी’ का ऐसा फंदा डाला कि एक झटके में ८० लाख लाडली बहनें ‘अपात्र’ घोषित कर दी गर्इं। अब यही कैंची किसानों की दो लाख की कर्ज माफी पर चलाई जा रही है, जहां शर्तों के जाल में फंसाकर लाखों किसानों को ‘अपात्र’ता के फंदे में फांस दिया है। महाराष्ट्र के हुक्मरानों ने जो धोखा लाडली बहनों के साथ किया, ठीक वही धोखा गरीब और कर्ज तले दबे किसानों के साथ किया जा रहा है। महाराष्ट्र में कुल किसानों की तादाद करीब सवा करोड़ है। सरकार का दावा है कि उन्होंने ५५ लाख किसानों का दो लाख तक का कर्ज माफ कर दिया। अगर इस आंकड़े में टैक्स भरनेवाले ६ लाख किसानों को भी जोड़कर अलग कर दें तो भी राज्य के पूरे ३४ लाख किसान आज भी कर्ज के बोझ तले दम तोड़ रहे हैं और टकटकी लगाए कर्जमुक्ति की आस में बैठे हैं। हुक्मरान भले ही ५५ लाख किसानों की कर्ज माफी का ढिंढोरा पीटते रहें, लेकिन इन बचे हुए ३४ लाख किसानों के सुलगते सवाल का जवाब तो उन्हें देना ही होगा!
