अनिल तिवारी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या पहुंचे आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधते हुए कहा, ‘दिल्ली की जनता ने उन्हें कई वर्षों तक अवसर दिया, लेकिन उन्होंने दिल्ली को भ्रष्टाचार के अलावा कुछ नहीं दिया। यदि आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के साथ वही न्याय किया होता, जो डबल इंजन की भाजपा सरकार ने अयोध्या के साथ किया है, तो दिल्ली भी अयोध्या धाम की तरह चमकती।’
योगी आदित्यनाथ ने यह दावा तो पूरे आत्मविश्वास के साथ किया, लेकिन जिस समय वह केजरीवाल को भ्रष्टाचार का आईना दिखा रहे थे, उसी समय अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे और दान से जुड़ी कथित गड़बड़ियों का मामला उनकी नाक के नीचे, उनकी ही सरकार में राम धन लूटने का प्रमाण दे रहा है। जो इस समय राजनीति के लिए गंभीर सवाल बन चुका है।
दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े एक प्रमुख भ्रष्टाचार मामले में फरवरी २०२६ में अदालत ने अरविंद केजरीवाल समेत कई आरोपियों के विरुद्ध मुकदमा आगे बढ़ाने के पर्याप्त आधार नहीं पाए थे। हलांकि, अभी कानूनी प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। इसलिए योगी जी अदालत के अंतिम निर्णय से पहले किसी को भ्रष्ट घोषित कर देना राजनीतिक बयानबाजी तो हो सकती है, न्यायिक निष्कर्ष नहीं। दूसरी ओर, अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए चढ़ावे और दान में कथित गबन को लेकर विशेष जांच दल की प्रारंभिक रिपोर्ट के बाद अब जाकर आठ लोगों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की है। आरोपियों पर चोरी, विश्वासघात, धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र जैसे गंभीर आरोप हैं। कुछ आरोपियों को तो गिरफ्तार किया गया है, जबकि बड़ी मछलियां अब भी आजाद हैं। ऐसे समय में मुख्यमंत्री का यह कहना कि अयोध्या के साथ पूरा ‘न्याय’ किया गया है, स्वाभाविक रूप से सवालों के घेरे में आता है। शहर की सड़कों, भवनों और रोशनी को चमकाना विकास का एक हिस्सा हो सकता है, लेकिन राम के नाम पर दिए गए श्रद्धालुओं के धन की सुरक्षा करना उससे कहीं बड़ी नैतिक जिम्मेदारी है। यदि भगवान के चरणों में अर्पित धन और बहुमूल्य वस्तुएं भी सुरक्षित नहीं हैं, तो केवल बाहरी चमक को आदर्श शासन का प्रमाण वैâसे माना जा सकता है?
विश्व हिंदू परिषद के नेता आलोक कुमार ने भी स्पष्ट किया है कि जांच केवल प्राथमिकी में नामित आठ लोगों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जिन अन्य लोगों पर आरोप हैं, उनकी भूमिका की भी जांच होनी चाहिए और कोई छोटी या बड़ी मछली बचनी नहीं चाहिए। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि चंपत राय और अनिल मिश्रा जैसे जिम्मेदार पदाधिकारी जांच के दायरे से स्वत: बाहर नहीं माने जा सकते। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसी आशंका को राजनीतिक भाषा देते हुए तंज कसा, ‘भाजपा राज में नाइंसाफी की दिखेगी ये झांकी, फुनगी को फांसी, शाखाओं को मिलेगी माफी।’ उनका आरोप है कि कार्रवाई केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित रखकर प्रभावशाली और जिम्मेदार लोगों को बचाने का प्रयास किया जा सकता है। यह आवश्यक नहीं कि जांच पूरी होने से पहले किसी भी पदाधिकारी को दोषी मान लिया जाए। लेकिन यह भी स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए कि कुछ कर्मचारियों पर मुकदमा दर्ज करके मामले को समाप्त नहीं माना जाना चाहिए। यह धन किसी राजनीतिक दल, सरकार या ट्रस्ट के पदाधिकारी की निजी संपत्ति नहीं था। यह उन करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का धन था, जिन्होंने भगवान राम के नाम पर अपनी कमाई अर्पित की थी।
जिस समय योगी आदित्यनाथ केजरीवाल को भ्रष्टाचार का आईना दिखा रहे थे, उस समय उनके शब्द उलटकर उन्हीं की सरकार से प्रश्न पूछते दिखाई दे रहे थे कि अयोध्या की चमक के पीछे श्रद्धालुओं के चढ़ावे की सुरक्षा और उसके हिसाब-किताब की जिम्मेदारी किसकी थी? जो लोग राम के नाम पर राजनीति करते हैं, उनकी जिम्मेदारी केवल मंदिर बनवाने तक सीमित नहीं हो सकती। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि राम के चरणों में रखा गया एक-एक रुपया सुरक्षित रहे। क्योंकि जो रामधन की रक्षा नहीं कर सके, उन्हें दूसरों के आचरण पर उपदेश देने से पहले स्वयं आईने में अवश्य देखना चाहिए।
