मुख्यपृष्ठस्तंभसफाई अभियान या मताधिकार पर संकट?

सफाई अभियान या मताधिकार पर संकट?

मतदाता सूची से करोड़ों नाम गायब

चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के दौरान १२ राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की मतदाता सूचियों से ५.८ करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने ने देश की चुनाव प्रक्रिया पर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। आयोग का कहना है कि मृत व्यक्तियों, स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाताओं, दोहरे पंजीकरण और अयोग्य प्रविष्टियों को हटाकर सूची को शुद्ध किया गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रत्येक नाम हटाने से पहले संबंधित मतदाता को पर्याप्त सूचना, सुनवाई और अपील का अवसर दिया गया? नए मतदाताओं के नाम जोड़े जाने के बाद भी करीब ५.२ करोड़ की शुद्ध कमी बताई गई है। यह संख्या पुनरीक्षण से पहले इन क्षेत्रों के कुल मतदाताओं के लगभग दस प्रतिशत के बराबर है। लोकतंत्र में इतनी बड़ी संख्या को केवल तकनीकी सुधार कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
विपक्ष और नागरिक संगठनों की चिंता है कि गरीब, प्रवासी मजदूर, किरायेदार, आदिवासी, महिलाएं और दस्तावेजों की कमी से जूझ रहे नागरिक इस प्रक्रिया में सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं।
नौकरी या रोजगार के कारण कुछ समय के लिए घर से बाहर मिला व्यक्ति ‘स्थानांतरित’ या ‘अनुपस्थित’ दर्ज हो सकता है, जबकि वह उसी क्षेत्र का वैध मतदाता हो।
चुनाव आयोग को राज्यवार और विधानसभा क्षेत्रवार बताना चाहिए कि कितने नाम मृत्यु, स्थानांतरण, दोहरी प्रविष्टि या दस्तावेजों की कमी के आधार पर हटाए गए। कितने मतदाताओं ने आपत्ति दर्ज की, कितने नाम बहाल हुए और कितनी अपीलें लंबित हैं-इसका भी सार्वजनिक विवरण आवश्यक है।
मतदाता सूची की शुद्धता जरूरी है, लेकिन किसी जीवित और योग्य नागरिक का नाम गलत तरीके से हटना उससे भी गंभीर अपराध है। मतदान का अधिकार छिनने के बाद चुनाव समाप्त हो जाए तो बाद में नाम बहाल होने का कोई व्यावहारिक अर्थ नहीं रहता।
पारदर्शी सत्यापन, व्यक्तिगत नोटिस, सरल अपील प्रक्रिया और स्वतंत्र ऑडिट के बिना करोड़ों नामों की कटौती चुनावी निष्पक्षता पर संदेह पैदा करेगी। मतदाता सूची साफ होनी चाहिए, लेकिन सफाई के नाम पर वैध मतदाता लोकतंत्र से बाहर नहीं होना चाहिए।

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