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एसआईआर या जनता की परीक्षा?

-जो जानकारी चुनाव आयोग के पास, वही दोबारा भरवाने का फरमान

सामना संवाददाता / मुंबई

मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण यानी एसआईआर के नाम पर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली आम नागरिकों के लिए सुविधा कम और परेशानी अधिक बनती दिखाई दे रही है। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण खुद आयोग का गणना प्रपत्र है। फॉर्म के ऊपरी हिस्से में मतदाता का नाम, मतदाता पहचान पत्र क्रमांक, पता, विधानसभा क्षेत्र, भाग क्रमांक, मतदान केंद्र और बीएलओ की जानकारी पहले से छपी हुई है। इसके बावजूद नीचे के कॉलम में मतदाता से लगभग वही विवरण दोबारा हाथ से भरवाया जा रहा है।
मतदाता को अपना नाम, वोटर आईडी नंबर, रिश्तेदार का नाम, उससे संबंध, जिला, राज्य, विधानसभा क्षेत्र, मतदान केंद्र और भाग क्रमांक जैसी जानकारियां फिर से लिखनी पड़ रही हैं। सवाल यह है कि जब ये सभी विवरण चुनाव आयोग के डेटाबेस में पहले से उपलब्ध हैं और फॉर्म पर भी मुद्रित हैं, तो इन्हें दोबारा लिखवाने से कौन-सा नया सत्यापन हो रहा है?
डिजिटल इंडिया के दौर में मतदाता से पहले से उपलब्ध रिकॉर्ड की नकल करवाना प्रशासनिक दक्षता नहीं, बल्कि कागजी खानापूर्ति नजर आती है। बुजुर्गों, कम पढ़े-लिखे नागरिकों, प्रवासी मजदूरों और दस्तावेजी प्रक्रियाओं से अनजान लोगों के लिए यह दोहराव और भी बड़ी मुश्किल पैदा कर सकता है। छोटी-सी लिखावट की गलती, अंक का अंतर या संबंध के विवरण में भ्रम आगे चलकर मतदाता के नाम पर आपत्ति का कारण भी बन सकता है। यदि चुनाव आयोग को केवल सूचना की पुष्टि चाहिए, तो पहले से भरे विवरण के सामने ‘सही/गलत’ का विकल्प और आवश्यक संशोधन के लिए अलग कॉलम दिया जा सकता था। मगर पूरी जानकारी दोबारा भरवाना यही सवाल खड़ा करता है कि एसआईआर मतदाता सूची सुधारने की प्रक्रिया है या नागरिकों को कागजों के जाल में उलझाने का नया उपक्रम।
जो जानकारी सरकार और चुनाव आयोग के पास पहले से मौजूद है, उसे नागरिक से बार-बार मांगने का लाभ किसे, मतदाता को या सिर्फ फाइलों को?

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