‘जंतर-मंतर’ आंदोलन ने जब मोदी सरकार की धज्जियां उड़ा रखी हैं, उसी दौरान तीन राज्यों के उपचुनावों के नतीजे भी बीजेपी की मनमानी को करारा झटका देने वाले हैं। बिहार और मध्य प्रदेश के उपचुनावों में मोदी-शाह के घमंड की हार हुई, जबकि गुजरात की मांजलपुर विधानसभा सीट बीजेपी बचाने में कामयाब रही। ये नतीजे भारतीय जनता के दिलों में पनप रही छटपटाहट का आईना हैं। इन तीनों उपचुनावों को ‘मिनी आम चुनाव’ या ‘जनता के मन का दर्पण’ कहना भले ही अतिशयोक्ति हो, फिर भी इसने मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम की तस्वीर साफ कर दी है। बांकीपुर (बिहार) की सीट बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने खाली की थी। नितिन नबीन जब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और उनका बोरिया-बिस्तर दिल्ली शिफ्ट हुआ तो उन्हें राज्यसभा में भेज दिया गया। बांकीपुर सीट १९९५ से बीजेपी का पारंपरिक गढ़ रही है। यहां नितिन नबीन और उनके पिता ने कम से कम दस चुनाव दमदार तरीके से जीते। बीजेपी के इस नायाब किले को प्रशांत किशोर ने ध्वस्त कर दिया। यहां राष्ट्रीय जनता दल का उम्मीदवार तीसरे नंबर पर खिसक गया। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष खुद अपना गढ़ नहीं बचा पाए, यह बेहद अहम बात है। इसे पूरी तरह से बीजेपी की हार माना जाना चाहिए। बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद ने तो यहां तक भौकाल मचा दिया था कि बांकीपुर में बीजेपी अगर किसी कुत्ते या बिल्ली को भी खड़ा कर दे तो जनता उसे वोट दे देगी। वे मतदाताओं को बंधुआ मानकर चल रहे थे। मतदाताओं को बेवकूफ बनाने की उनकी कोशिश उन पर ही भारी पड़ गई। इस जीत के साथ प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को विधानसभा में जगह मिल गई। जनता ने तेजस्वी यादव को नकार दिया क्योंकि उनमें निरंतरता का अभाव है। दूसरी बात यह कि बिहार की जनता
जातीय राजनीति से
ऊब चुकी है। उन्हें शिक्षा और रोजगार चाहिए। बांकीपुर सीट पर मुस्लिम और यादव बहुसंख्यक हैं और उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल के बजाय प्रशांत किशोर का साथ देना पसंद किया। बिहार की राजनीति में आया यह बदलाव एक नई दिशा दिखानेवाला है। नितिन नबीन के स्वागत के दौरान उनके काफिले के आगे ‘हनुमान’ नचाने का ड्रामा रामभक्तों को रास नहीं आया। राम मंदिर लूट की खबरों से बीजेपी का वोटर वैसे ही नाराज था, ऊपर से ‘जंतर-मंतर’ पर ‘जेन-जी’ आंदोलन की वजह से बांकीपुर के युवा मतदाताओं ने बीजेपी की बैंड बजा दी। यह बीजेपी के लिए एक सबक है। कुछ लोग यह विश्लेषण कर सकते हैं कि प्रशांत किशोर को बीजेपी ने ही जितवाया और उनकी जीत ने ‘जंतर-मंतर’ व राम मंदिर लूट जैसे ज्वलंत मुद्दों पर ठंडा पानी डाल दिया; लेकिन इस बात में कोई दम नहीं है। जो बांकीपुर में हुआ, वही मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर दोहराया गया। कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने बीजेपी उम्मीदवार को धूल चटा दी। यह सीट कांग्रेस विधायक के अयोग्य ठहराए जाने से खाली हुई थी। इसे जीतने के लिए बीजेपी ने साम, दाम, दंड, भेद सब आजमा लिया, फिर भी जनता ने उन्हें ठुकरा दिया। गुजरात की मांजलपुर सीट बीजेपी जीत गई, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है; लेकिन बांकीपुर और दतिया में बीजेपी की ऐसी फजीहत हुई है कि ‘बूंद से गई, वो हौद से नहीं आती’। कहावत फिट बैठ रही है। बिहार के बीजेपी मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी अपराधी हैं। ‘बिहार को एक पढ़ा-लिखा मुख्यमंत्री चाहिए’, प्रशांत किशोर के इस प्रचार को मतदाताओं ने स्वीकार किया। मध्य प्रदेश और बिहार दोनों जगह बीजेपी की सरकार होते हुए भी उन्हें यह करारी हार झेलनी पड़ी। उपचुनावों की जीत को जनादेश नहीं कहा जा सकता, लेकिन भारतीय राजनीति में कई उपचुनावों ने ‘हवा का रुख’ बदला है। १९८८ में वी. पी. सिंह ने
इलाहाबाद उपचुनाव
जीतकर कांग्रेस को शिकस्त दी थी। उस चुनाव में ‘बोफोर्स’ का मुद्दा खूब गरमाया था। वहीं से कांग्रेस के खिलाफ माहौल बना, १९८९ के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार हुई और देश में गठबंधन की राजनीति का नया दौर शुरू हुआ। २०१८ में गोरखपुर और फूलपुर उपचुनावों में भी बीजेपी की हार हुई थी। योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफे के बाद समाजवादी पार्टी ने बीजेपी के इन मजबूत गढ़ों पर कब्जा जमाया था, जिससे विपक्षी दलों का हौसला बुलंद हुआ। बांकीपुर और दतिया में बीजेपी की हार ने विपक्ष को वही आत्मविश्वासी ताकत दी है। ‘जंतर-मंतर’ पर आंदोलनकारियों पर हुए हमलों और राम मंदिर लूट के मुद्दे पर बीजेपी का आत्मविश्वास डगमगा गया है। प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह एक तरह से संसद से भाग खड़े हुए हैं। शाह ने देश की लगभग तमाम विपक्षी पार्टियों को तोड़ा है; क्षेत्रीय दलों के सांसदों को खरीदकर बहुमत का पहाड़ खड़ा किया है, फिर भी विपक्ष उनकी छाती पर चढ़कर नाच रहा है। मोदी-शाह की तानाशाही के खिलाफ देश के युवाओं ने चुनौती खड़ी कर दी है इसीलिए संसद हो या सड़क, मोदी-शाह के इस खरीदे हुए बहुमत को कोई पूछ नहीं रहा। बिहार के बांकीपुर और मध्य प्रदेश के दतिया उपचुनावों के नतीजे उनकी भ्रष्ट और घटिया सरकार के खिलाफ जनता का साफ जनादेश हैं। ‘पैलेट गन’ का बदला जनता ने उपचुनावों में हार के जरिए लिया है। मोदी-शाह की शैतानी राजनीति के अंत की शुरुआत हो चुकी है। अगर विपक्ष अपना अहंकार दरकिनार कर दे तो मोदी-शाह की इस तानाशाही का पराभव तय है!
