मुख्यपृष्ठस्तंभमैथिली व्यंग्य: श्रोता हेबाक आनंद!

मैथिली व्यंग्य: श्रोता हेबाक आनंद!

डॉ. ममता शशि झा / मुंबई

जगदीश बाबू के आब जगह-जगह पर मुख्य अतिथि, विशेष अतिथि या अध्यक्षक पदक लेल साहित्य जगत के लोक सब आमंत्रित कर लागल छलनि, जाहि सं ओ बहुत परेशान भे गेल छलथि। जहिया स हुनकर लिखल एकटा कविता सोशल मीडिया पर प्रसारित भे के लोक द्वारा बहुत पसंद केल गेलनि तहिया स। जहन की ओ कविता ककरो आर के लिखल छलई। आइयो भोरे फोन एलनि जे फलां समारोह में पत्नी संगे एबाक छनि ते मोन आर माहुर भे गेलनि। सोच लगला जे केहन बढ़िया श्रोता बनि क जाय छलहुं, ई अनेरो के एकटा ढोल गरा में पड़ि गेल, कुमुने एकरा बजबइत रहू। श्रोता बनि के जेबाक सुखे अलग होई छई कहुना चलि, कखनो चलि जाउ। कहुना बैसू, जहने मोन भेल तखने उठि के ककरो स गप्प कर लेल जाऊ। आ जत खाय-पिबाक व्यवस्था रहई ओत जहने भोजन शूरू भेलई जा के खा लिय। मंचासिन लोकक गप्प सुनबाक अछि की नहि से अपने निर्णय ले सकई छी। श्रोता मतलब बुझियउ जे अपन मोनक राजा! मंच पर विशेष अतिथि या मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित रहला पर अहि तरहक कोनो छूट नहि रहई छई। कखनो काल ते एहन कार्यक्रम में बजाओल जाय छलनि आयोजक सबके सेहो ठीक स जानकारी नहि रहई छनि जे आयोजन कियेक भे रहल छई। एक ते मंच पर बैसबाक अछि ते एक्कहि मुद्रा में बैसल बैसल मोन तबाह भे जाय छई, झुठो के हंसईत रह के कारणे अकच्छ भे जाईत छई। नीक कपड़ा लत्ता पहिर के तनाव रहई छई, बिना मतलब के हंसनाई पर प्रतिबंध लागि जाय छई, ककरो सं नजर मिलला पर सिर्फ मुस्किएबाक रहई छई। मुख्य अतिथि या विशेष अतिथि रहला पर ते तईयो अगड़म-बगड़म बाजि के बैसल जा सकई छई, श्रोता आ वक्ता दुनु की बजलखिन से नहिं बुझि पबई छथिन। आ तकरा बाद मंच पर आब बला बजनाहर सबके मोन हुए त सुनु आ नइ त अनसुना क दियउ जेना अहां के नहिं सुनने छला। सबस बेसी दिक्कत होई छनि अध्यक्ष जी के जिनका सबहक बात सुन पड़ई छनि, सबहक उत्तर देब पड़ई छनि आ पसंद अबउन की नहि हुनकर प्रशंसा कर पड़ई छनि। नीक जकां बनि-ठनि के जाय पड़ई छनि, कखनो काल ते दूर रहला पर अपना तरफ स खर्च के क जाय पड़ई छनि। भूख लगला पर आ भोजन तैयार रहला के बावजूद औपचारिकता वश उठी के नहिं जा सकई छी। जगदीश बाबू अहि सँ मुक्त भे के विमुक्त श्रोता के श्रेणी में जेबाक लेल अकुलायल छथि। श्रोता में सं जं क्यो मंचासिन होब चाहई छी ते जगदीश बाबू एकदम खुशी-खुशी तैयार छथि!

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