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अंदर की बात : चेतावनी किसे? नाम नहीं लिया, लेकिन निशाना सब समझ गए

राजन पारकर

वनमंत्री गणेश नाईक ने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन राजनीति में बिना नाम लिए दिया गया संदेश सबसे ज्यादा असरदार माना जाता है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि क्लस्टर पुनर्विकास का मुद्दा अब केवल विकास का विषय नहीं रहा, बल्कि यह राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई बन चुका है।
सूत्रों के अनुसार, सत्ता में साथ रहनेवाले कई नेता अब एक-दूसरे के पैâसलों पर खुलकर सवाल उठाने लगे हैं। जब मंत्री ही मंत्री की योजनाओं पर सार्वजनिक नाराजगी जताने लगें तो समझ लीजिए कि गठबंधन की दीवारों में दरारें दिखाई देने लगी हैं। सत्ता की कुर्सी पर बैठनेवाले अक्सर जनता को कम और एक-दूसरे को ज्यादा जवाब देते हैं। आज महाराष्ट्र की राजनीति उसी मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहां चेतावनी विपक्ष को नहीं, बल्कि अपने ही घर के लोगों को दी जा रही है।
चेतावनी, सफाई और कुर्सियों का नया गणित
राजनीतिक गलियारों में इन दिनों तीन अलग-अलग घटनाओं ने सत्ता की बेचैनी उजागर कर दी है। कहीं मंत्री अपने ही सहयोगियों को संकेतों में चेतावनी दे रहे हैं, कहीं नेताओं को सफाई देकर अपनी राजनीतिक साख बचानी पड़ रही है तो कहीं दिल्ली की सत्ता में संभावित फेरबदल की चर्चाएं तेज हैं। सत्ता का हर चेहरा मुस्कुराता जरूर दिखाई देता है, लेकिन बंद कमरों में समीकरण बदलने की आहट साफ सुनाई दे रही है। सूत्रों के अनुसार, आनेवाले दिनों में महाराष्ट्र और दिल्ली की राजनीति में कई अप्रत्याशित घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं।
सफाई जितनी लंबी, चर्चा उतनी गहरी
धनंजय मुंडे ने विवाद से इनकार करते हुए सोशल मीडिया पर विस्तृत सफाई दी, लेकिन राजनीति का पुराना नियम है- जिस घटना पर सबसे ज्यादा सफाई दी जाती है, उसी पर सबसे ज्यादा सवाल उठते हैं। सूत्रों के अनुसार, बीड की बैठक में क्या हुआ, यह जितना महत्वपूर्ण नहीं, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उसके बाद राजनीतिक माहौल इतना गर्म क्यों हुआ। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जिले की राजनीति में अंदरूनी तनाव लगातार बढ़ रहा है और आनेवाले स्थानीय समीकरणों पर इसका असर पड़ सकता है। ‘राजनीति में कभी-कभी चुप्पी सबसे बड़ी सफाई होती है और लंबी सफाई सबसे बड़ा संदेह पैदा कर देती है।’ जनता अब बयान नहीं, बल्कि आनेवाले राजनीतिक कदमों को देख रही है।
दिल्ली की कुर्सियां हिलेंगी?
केंद्र में बड़ा फेरबदल होगा और देवेंद्र फडणवीस को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिल सकती है। यह दावा कितना सही है, इसका पैâसला समय करेगा, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस बयान ने नई चर्चाओं को जन्म जरूर दे दिया है। सूत्रों के अनुसार, दिल्ली में मंत्रिमंडल विस्तार और संगठनात्मक बदलाव को लेकर लगातार बैठकों का दौर चल रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष ऐसे हर संकेत को सत्ता परिवर्तन की प्रस्तावना बताने में जुटा है। दिल्ली की राजनीति में अफवाहें कभी बिना कारण पैदा नहीं होतीं और हर अफवाह के पीछे कोई न कोई राजनीतिक गणित जरूर छिपा होता है। फिलहाल इतना तय है कि सत्ता की शतरंज पर हर खिलाड़ी अगली चाल सोच रहा है और मोहरे अभी पूरी तरह खुले नहीं हैं। सत्ता के गलियारों में इस समय मुस्कानें जितनी चौड़ी दिखाई दे रही हैं, उतनी ही गहरी बेचैनी बंद कमरों में महसूस की जा रही है। कोई सहयोगी को संकेत दे रहा है, कोई सफाई देकर नुकसान रोकने की कोशिश कर रहा है और कोई दिल्ली की नई कुर्सियों का सपना देख रहा है। सूत्रों के अनुसार, आनेवाले कुछ सप्ताह महाराष्ट्र और केंद्र दोनों की राजनीति में कई नए समीकरण सामने ला सकते हैं। कौन नाराज है, किसका राजनीतिक कद बढ़ेगा, किसकी कुर्सी डगमगाएगी और किसे नई जिम्मेदारी मिलेगी, यही है अंदर की बात।

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