मुख्यपृष्ठस्तंभअंदर की बात : बारिश, मिलावट और बयानबाजी का मौसम

अंदर की बात : बारिश, मिलावट और बयानबाजी का मौसम

राजन पारकर

महाराष्ट्र में इन दिनों बादल केवल पानी ही नहीं बरसा रहे, बल्कि राजनीति, प्रशासन और आरोपों की बौछार भी साथ ला रहे हैं। कहीं मंत्री अपनी जागी हुई रातों का हिसाब दे रहे हैं, कहीं वर्षों से चल रहे कथित मिलावट के कारोबार पर अचानक गाज गिर रही है, तो कहीं नेताओं की मुस्कान और बयान राजनीतिक तूफान बन रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, सत्ता और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी पटकथा लिख रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि आने वाले चुनावों की आहट के साथ हर घटना अब केवल घटना नहीं, बल्कि राजनीतिक अवसर भी बनती जा रही है। जनता फिलहाल एक ही सवाल पूछ रही है कि क्या राहत, जवाबदेही और संवेदनशीलता भी कभी सुर्खियों में आएंगी, या फिर सुर्खियां केवल सियासी संवादों तक ही सीमित रहेंगी।
सत्ता की नींद उड़ी या कैमरे की?
महाराष्ट्र में बारिश ने ऐसा कहर बरपाया कि सड़कें नदियां बन गर्इं और जनता राहत की नाव तलाशती रही। उधर मंत्री जी ने घोषणा कर दी कि पिछले तीन-चार दिनों में उन्हें तीन घंटे भी सोने का समय नहीं मिला। अब राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि आजकल नेताओं की नींद से ज्यादा उनकी जागने की प्रेस कॉन्फ्रेंस चर्चा का विषय बन गई है। सूत्रों के अनुसार, मंत्रालय में यह भी चर्चा है कि संकट के समय जनता को राहत चाहिए या नेताओं के जागरण का हिसाब, यह सवाल अब आम लोगों के बीच उठने लगा है। कुछ लोग कहते हैं कि अगर प्रशासन पहले से जागा होता तो शायद मंत्री जी को अपनी नींद का त्याग सार्वजनिक रूप से बताने की नौबत ही नहीं आती। राजनीति में आजकल काम से ज्यादा काम का प्रचार भी राहत सामग्री का हिस्सा बन चुका है।
दूध में मिलावट या सिस्टम में?
अन्न एवं औषधि प्रशासन की कार्रवाई में करोड़ों रुपये के कथित नकली दूध के कारोबार का भंडाफोड़ हुआ। कई जिलों में छापे पड़े, गिरफ्तारियां हुर्इं और बड़े गिरोह के सामने आने का दावा किया गया। लेकिन सत्ता के गलियारों में चर्चा इससे भी बड़ी है। सूत्रों के अनुसार, सवाल यह उठ रहा है कि यह जहरीला कारोबार अचानक पैदा नहीं हुआ होगा। राजनीतिक हलकों में कानाफूसी है कि वर्षों तक यह धंधा किसकी नाक के नीचे चलता रहा? कौन से संरक्षण में फलता-फूलता रहा? कार्रवाई जितनी बड़ी है, उतना ही बड़ा सवाल जवाबदेही का भी है। प्रशासन की सख्ती का स्वागत हो रहा है, लेकिन लोग यह भी पूछ रहे हैं कि अगर ईमानदार अधिकारी पहले आ जाते, तो क्या जनता इतने वर्षों तक ‘दूध’ के नाम पर रसायन पीती रहती।
हंसी का मौसम और संवेदनाओं का सूखा
मुंबई में बारिश से हादसे हो रहे हैं, लोग जान गंवा रहे हैं और इसी बीच एक वायरल वीडियो ने राजनीतिक माहौल गरमा दिया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष के एक नेता गंभीर हालात पर भी मुस्कुराते दिखाई दिए। इसके बाद आरोप-प्रत्यारोप का नया दौर शुरू हो गया। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि आजकल नेताओं के चेहरे पर मुस्कान कब आनी चाहिए और कब नहीं, इसका फैसला भी सोशल मीडिया करने लगा है। सूत्रों के अनुसार, जनता अब भाषण से ज्यादा भावनाएं पढ़ रही है। कानाफूंसी यह भी है कि आने वाले स्थानीय निकाय चुनावों से पहले संवेदनशीलता भी राजनीतिक पूंजी बन चुकी है। जनता पूछ रही है कि संकट की घड़ी में कैमरे के सामने मुस्कुराहट बड़ी है या पीड़ितों के आंसू?

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