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संपादकीय :  डॉ. मुखर्जी और आज की भाजपा

भारतीय जनता पार्टी का हिंदुत्व, उनका राष्ट्रवाद वगैरह एक अजीब रसायन है। उसमें शुद्ध और पवित्र जैसा कुछ भी नहीं है। हिंदुत्व के नाम पर अयोध्या पर कब्जा किया और सीधे श्रीराम मंदिर में डाका डाल दिया। इस डवैâती मामले में चंपत राय को दूर किया, पर चंपत की जगह जिन्हें लाया गया वो बजरंग लाल बागड़ा हैं। उनके पहले के कारनामे देखे जाएं तो चंपत ही अच्छे थे, ऐसा ही कहना पड़ेगा। ऐसा क्यों? इसका कारण भाजपा की रचना में ही घोटाला है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की १२५वीं जयंती भाजपा ने ६ तारीख को मनाई। (डॉ. मुखर्जी ही भाजपा के मूल पिताश्री हैं।) प्रधानमंत्री मोदी से लेकर कई बड़े नेताओं ने डॉ. मुखर्जी पर श्रद्धासुमन अर्पित किए। प्रधानमंत्री मोदी ने डॉ. मुखर्जी को अखंड भारत के प्रणेता कहा है। मुखर्जी राष्ट्रवादी (प्रखर), महान शिक्षाविद, सशक्त और आत्मनिर्भर भारतराष्ट्र के निर्माण में लगे उनके जीवन के बारे में मोदी ने जनता को जानकारी दी। डॉ. मुखर्जी के राष्ट्रकार्य की महिमा बताने वाला लेख प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा और प्रकाशित करवाया। उस लेख में डॉ. मुखर्जी को भारत के भाग्यविधाता वगैरह कहा गया है। यह बनावटीपन है। देश के असली भाग्यविधाताओं की जयंती-मृत्यु तिथि पर श्रद्धांजलि के शब्दों को कंजूसी से इस्तेमाल करना और देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में ‘उल्टी’ भूमिका निभाने वालों पर फूल बरसाना। डॉ. मुखर्जी के मामले में भी यही दिख रहा है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय जनसंघ के संस्थापक हैं। उसी जनसंघ का आज ‘भाजपा’ बन गया है। मतलब भाजपा के मूल संस्थापक डॉ. मुखर्जी ही हैं। मुखर्जी का भारत के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान शून्य है। फिर भी पंडित नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में उन्हें जगह मिली। विचारधारा अलग हो, फिर भी राष्ट्र निर्माण के लिए सबकी जरूरत है, ऐसा पंडित नेहरू का मानना था। डॉ. मुखर्जी का राष्ट्र के प्रति कर्तव्य क्या था? इस विषय पर हाल के दिनों में कई दबे हुए मामले सामने आए हैं। डॉ. मुखर्जी असल में कौन थे? यह उजागर हुआ है।
‘भाजपा’ का अतिवादी हिंदुत्ववाद
और राष्ट्रवाद की बदहजमी का कारण भी यही है। महात्मा गांधी की हत्या हुई तब डॉ. मुखर्जी जैसे लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पाकिस्तान बनने का ठीकरा इन लोगों ने गांधी पर फोड़ दिया, पर खुद ये स्वतंत्रता आंदोलन में कहीं भी नहीं थे। इसलिए देश का विभाजन रोकने में भी ये कुछ नहीं कर सके। गांधी की हत्या ईश्वरीय वरदान है, ऐसा इन लोगों ने मान लिया और गांधी हत्या के आरोपियों के बचाव के लिए चंदा इकट्ठा करने की मुहिम ये चलाने लगे। तब गृहमंत्री सरदार पटेल ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जमकर फटकार लगाई! गांधी के हत्यारों की मदद करना अमानवीय, विकृत और देशद्रोह जैसा कृत्य है, ऐसा सरदार पटेल ने डॉ. मुखर्जी को सुनाया। डॉ. मुखर्जी बंगाल की सुहरावर्दी सरकार में भी शामिल थे। वो लगभग-लगभग मुस्लिम लीग की ही सरकार थी। स्वतंत्रता, हिंदुत्व, राष्ट्रवाद जैसे विचारों से मुखर्जी का दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। डॉ. मुखर्जी कोलकाता विश्वविद्यालय के कुलगुरु थे। विश्वविद्यालय में घुसते ही अंग्रेजों के ‘यूनियन जैक’ को सल्यूट मारने की सख्ती मुखर्जी ने विद्यार्थियों पर की थी और ऐसा आदेश उन्होंने जारी किया था। एक छात्र ने ‘यूनियन जैक’ को ‘सल्यूट’ करने से मना कर दिया, तब उसे विश्वविद्यालय से निकाल दिया और ब्रिटिश सरकार से उस छात्र की शिकायत की। महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता की लड़ाई को आखिरी मोड़ पर पहुंचाया और ‘चले जाओ’ का नारा दिया। लोगों को सड़क पर उतरने का आह्वान किया। डॉ. मुखर्जी ने ‘अंग्रेज चले जाओ’ आंदोलन का विरोध किया। इतना ही नहीं, बल्कि ‘चले जाओ’ आंदोलन को बल प्रयोग करके कुचल दो, ऐसा सुझाव अंग्रेज सरकार को दिया। नेताजी सुभाषचंद्र बोस जब आजाद हिंद सेना को लेकर भारत की तरफ बढ़ने लगे, तब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नेताजी का विरोध किया। आजाद हिंद सेना और नेताजी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करो, ऐसा सुझाव उन्होंने अंग्रेज सरकार को दिया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से डॉ. मुखर्जी ने किनारा कर लिया और मौका मिलने पर
स्वतंत्रता सेनानियों का विरोध
करते रहे। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और नेताजी के फॉरवर्ड ब्लॉक पार्टी के बीच संघर्ष इतना बढ़ गया कि मुखर्जी जब बंगाल में सभा करते थे तब नेताजी के फॉरवर्ड ब्लॉक के कार्यकर्ता उनकी सभा तितर-बितर कर देते थे। उन पर पत्थर फेंकते थे। आगे चलकर हिंदुत्ववादी विचारों वाले जनसंघ की उन्होंने स्थापना की। वीर सावरकर की हिंदू महासभा का विरोध करने के लिए ही मुखर्जी ने यह सब किया, ऐसा कहा जाता है। वीर सावरकर हिंदुत्व की वकालत कर रहे थे तब मुखर्जी ने जनसंघ क्यों बनाया? उसके पीछे कोई अलग शक्ति काम कर रही थी। ३७० के विरोध में मुखर्जी ने कश्मीर जाकर बलिदान दिया, ऐसा बताया गया। जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में खुद पर छोटी-सी खरोंच तक नहीं आने दी, उन्होंने अखंड हिंदुस्थान के लिए बलिदान दिया, ये दंतकथा लगती है। सरदार वल्लभभाई पटेल जब भारतीय संविधान सभा में ‘३७०’ पास करवा रहे थे, तब डॉ. मुखर्जी ने उसके विरोध में एक शब्द भी नहीं कहा। डॉ. आंबेडकर संसद में हिंदू कोड बिल पास करवाने की कोशिश कर रहे थे। तब डॉ. मुखर्जी ने हिंदू कोड बिल का विरोध तो किया ही, साथ में डॉ. आंबेडकर का भी अपमान किया। इसलिए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अखंड हिंदुस्थान का प्रणेता वगैरह ठहराना व्यर्थ है। मुखर्जी की जयंती के नाम पर केंद्र सरकार के खजाने से करोड़ों रुपए प्रचार पर खर्च होते हैं, इसका क्या औचित्य है? राष्ट्र निर्माण, उससे पहले स्वतंत्रता संग्राम एवं किसी भी आंदोलन में उनके सहभागी होने के सबूत नहीं हैं। मुखर्जी को मानने वाला समाज राममंदिर ट्रस्ट का काम देखता है और उन्होंने प्रभु श्रीराम के मंदिर पर सबसे बड़ा डाका डाला है। इन्हीं लोगों ने हिंदुत्ववादी शिवसेना के टुकड़े किए और उसके लिए संविधान का दुरुपयोग किया। यही वो लोग हैं, जो पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तानियों को सिर्फ खोखली धमकी देते रहे और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ अधूरा छोड़कर गायब हो गए। प्रे. ट्रंप के दबाव में झट से पीछे हट गए। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को मानने वालों से देशभक्ति और शौर्य की उम्मीद करना बेकार है। उनके कारण देश, हिंदुत्व और राम असुरक्षित हो गए हैं, यही सच है!

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