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राम मंदिर चढ़ावा चोरी… दान पेटी की चाबी जेब में… भतीजे की ड्यूटी कैश में!.. मिलकर चला ‘हुंडी’ का खेल!

सामना संवाददाता / अयोध्या

राम मंदिर के चढ़ावे में कथित गड़बड़ी को लेकर एसआईटी रिपोर्ट ने कई चौंकाने वाले सवाल खड़े कर दिए हैं। सोमवार को राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास की बैठक में रखी गई रिपोर्ट के मुताबिक, रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू मंदिर परिसर में अलग-अलग जगह रखी हुंडियों की चाबियां ट्रस्ट प्रतिनिधि के तौर पर अपने पास रखता था, जबकि इसके लिए उसे कोई औपचारिक अधिकार जारी नहीं किया गया था।
रिपोर्ट में आरोप है कि गबन की साजिश को अंजाम देने के लिए टिन्नू ने अपने भतीजे मनीष यादव को ट्रस्ट में नौकरी दिलवाई और फिर उसकी ड्यूटी चढ़ावे की गणना में लगवाई। यानी चाबियों पर पकड़ भी अपने पास और गिनती में अपना आदमी भी, यहीं से पूरा खेल शुरू हुआ।
नहीं मिला पूरा हिसाब
एसआईटी को केवल २७ अप्रैल २०२६ से आगे के ४५ दिनों की फुटेज ही मिल पाई। इसके पहले कब-कब चोरी हुई और कितना चढ़ावा गायब किया गया, इसका पूरा हिसाब सामने नहीं आ सका।
गणना प्रभारी जिम्मेदार
एसआईटी ने गणना प्रभारी सुभाष श्रीवास्तव की जिम्मेदारी भी तय की है। रिपोर्ट के अनुसार, उसकी मौजूदगी में रकम पार की गई। इसी आधार पर उस पर भी केस दर्ज किया गया है। रिपोर्ट के पहले ही बिंदु में बताया गया है कि आरोपी नोटों की गड्डियां पार करते थे। यह बड़ा खुलासा सीसीटीवी फुटेज से हुआ।
पहले का रिकॉर्ड कहां गया?
एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा है कि फुटेज सीमित समय की मिलने के कारण चोरी की कुल घटनाओं और वास्तविक गबन राशि का आकलन नहीं हो पाया। यानी राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी का जो चेहरा अभी दिखा है, वह संभव है कि पूरी तस्वीर न हो। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि फुटेज सीमित क्यों मिली और उससे पहले का रिकॉर्ड कहां गया?
४५ दिन की फुटेज में दिखी ७० बार ‘हाथ की सफाई’!
राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी का मामला अब सिर्फ नोटों की गड्डियां पार करने तक सीमित नहीं रह गया है। एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट ने मंदिर के चढ़ावा प्रबंधन, निगरानी व्यवस्था, बैंक अधिकारियों की भूमिका और ट्रस्ट के पर्यवेक्षण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट का सार यही है कि जहां हर कदम पर सुरक्षा होनी चाहिए थी, वहां नियम कागजों में थे और व्यवस्था भरोसे के सहारे चल रही थी। इसी ढिलाई का फायदा उठाकर आरोपियों ने हुंडियों के चढ़ावे में सेंध लगा दी।
रिपोर्ट के मुताबिक, अपराध इसलिए संभव हुआ क्योंकि निर्धारित सुरक्षा उपायों का पालन नहीं किया गया। गणना कक्ष में प्रवेश, तलाशी, निर्धारित वेशभूषा, निजी वस्तुओं पर रोक, हुंडीवार गणना, मूल्यवर्गवार अभिलेखीकरण और प्रभावी पर्यवेक्षण जैसी व्यवस्थाएं लागू नहीं थीं। ट्रस्ट और बैंक से जुड़े प्रतिनिधियों की मौजूदगी के बावजूद निगरानी प्रभावी नहीं रही।
एसआईटी ने साफ लिखा है कि यदि गणना के दौरान सीसीटीवी फुटेज सतर्कता से देखी जाती तो चोरी की घटनाएं रोकी जा सकती थीं। गणना कक्ष में वैâमरे तो लगे थे, लेकिन कैमरों की मौजूदगी निगरानी में नहीं बदल सकी। यही वजह रही कि उपलब्ध ४५ दिन की फुटेज में आरोपी ७० बार चोरी करते हुए वैâद हुआ। सवाल यह है कि जब कैमरा सब देख रहा था तो देखने वाले क्या कर रहे थे?
सबसे गंभीर बात सीसीटीवी बैकअप को लेकर सामने आई है। नकदी गणना जैसे संवेदनशील कार्य के लिए केवल ४५ दिन की फुटेज सुरक्षित रखना उचित नहीं माना गया। पहले १८० दिन की फुटेज संरक्षित रखने का सुझाव दिया गया था, लेकिन उसका पालन नहीं हुआ। इसी कारण २७ अप्रैल २०२६ से पहले की घटनाओं का पूरा हिसाब सामने नहीं आ पाया। एसआईटी ने भी माना है कि सीमित फुटेज के कारण चोरी की कुल घटनाओं और वास्तविक गबन राशि का आकलन नहीं हो सका।
गणना कक्ष प्रभारी प्रमुख रूप से जिम्मेदार
गणना कक्ष प्रभारी सुभाष श्रीवास्तव को भी सुरक्षा व्यवस्था लागू कराने के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार माना गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उसकी मौजूदगी में रकम पार की गई और नियमित तलाशी सुनिश्चित नहीं होने से चोरी की घटनाओं को रोकने में विफलता रही। इसी आधार पर उसके खिलाफ भी केस दर्ज किया गया है।
गंभीर प्रशासनिक चूक
मामले का सबसे बड़ा नाम रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू है। रिपोर्ट के अनुसार, मंदिर परिसर की विभिन्न हुंडियों की चाबियां उसके पास रहती थीं, जबकि इसके लिए कोई औपचारिक या लिखित अधिकार नहीं मिला। एसआईटी ने इसे गंभीर प्रशासनिक चूक माना है। आरोप है कि उसने अपने रिश्तेदार मनीष कुमार यादव को ट्रस्ट में नौकरी दिलवाकर गणना ड्यूटी में लगवाया, जिससे उसे कथित गबन का अवसर मिला।
संदेह के घेरे में बैंक अधिकारी
बैंक अधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में है। रिपोर्ट के अनुसार, बैंक की ओर से गणना कर्मियों को निर्धारित वेशभूषा उपलब्ध नहीं कराई गई। बैंक प्रतिनिधि गणना के दौरान मौजूद रहते थे, लेकिन निगरानी प्रभावी नहीं रही। गणना प्रक्रिया में लगे कर्मियों की देखरेख की जिम्मेदारी बैंक की थी। अधिकारियों का मासिक रोटेशन भी प्रावधानित था, लेकिन उसका पालन नहीं हुआ।
चंपत राय और गोपाल राव के नाम नहीं
रिपोर्ट में चंपत राय और गोपाल राव का जिक्र नहीं होने पर भी सवाल उठ रहे हैं। चर्चा यह है कि क्या एसआईटी ने उन्हें क्लीन चिट दे दी है या फिर विस्तृत जांच में उनकी भूमिका अलग से देखी जा रही है। यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि टिन्नू पहले ट्रस्ट महासचिव चंपत राय के चालक के रूप में मंदिर से जुड़ा था। धीरे-धीरे उसका प्रभाव बढ़ा और वह कई निर्णयों में दखल देने लगा। टिन्नू के आर्थिक नेटवर्क की भी जांच चल रही है। बताया जा रहा है कि उसने अपनी निजी गाड़ी ट्रस्ट में किराए पर लगवा दी थी, जिससे उसे हर महीने भाड़ा मिलता था। पुलिस उसके अन्य आय स्रोतों, प्रॉपर्टी डीलरों से संपर्क और संभावित जमीन निवेश की भी जांच कर रही है। सूत्रों के अनुसार, चोरी की रकम कहीं जमीन या संपत्ति में तो नहीं खपाई गई, इस दिशा में भी पड़ताल हो रही है।
६ फरवरी २०२५ की एसओपी बनी, लेकिन लागू नहीं हुई।
गणना कक्ष में तलाशी, ड्रेस कोड और निजी वस्तुओं पर नियंत्रण नहीं था।
अनिल मिश्रा की निगरानी पर सवाल, सुभाष श्रीवास्तव जिम्मेदार
रिपोर्ट में चंपत राय और गोपाल राव का जिक्र नहीं,
टिन्नू के आर्थिक नेटवर्क और प्रॉपर्टी कनेक्शन की भी जांच जारी
डॉ. मिश्रा पर गंभीर टिप्पणी
रिपोर्ट में डॉ. अनिल मिश्रा की भूमिका पर भी गंभीर टिप्पणी की गई है। उन्हें २० सितंबर २०२४ को दान और चढ़ावा प्रबंधन की जिम्मेदारी दी गई थी। ट्रस्ट प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने बैंक के साथ मिलकर दिशा-निर्देश जारी किए थे। एसओपी लागू होने के बाद उसकी समीक्षा और निगरानी सुनिश्चित करना भी उनकी जिम्मेदारी थी, लेकिन एसआईटी के अनुसार, सतत पर्यवेक्षण और अनुश्रवण में कमी रही। इसी आधार पर उनकी लापरवाही तय की गई है।
सबसे बड़ा सवाल:
१८० दिन की फुटेज सुरक्षित रखने की सलाह के बावजूद केवल ४५ दिन का बैकअप क्यों रखा गया? और २७ अप्रैल २०२६ से पहले की फुटेज कहां गई?
एसओपी का पालन नहीं
रिपोर्ट में ६ फरवरी २०२५ को बनी एसओपी का भी जिक्र है। इसमें तय था कि गणना कक्ष में किसकी आवाजाही होगी, गणना कर्मियों की एंट्री कब होगी, वे किस तरह की वेशभूषा में रहेंगे और गणना से पहले तथा बाद में उनकी तलाशी कैसे होगी। लेकिन बाद में इन निगरानी नियमों को शिथिल कर दिया गया। एसआईटी ने इसे चिंता और जांच का विषय बताया है कि पदाधिकारियों ने किन परिस्थितियों में ये बदलाव किए।

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