एड. राजीव मिश्र, मुंबई
मनोहर सुबहिये से भरपूर टेंशन में बइठा रहें तब तक कउनउ ओर से रामहित आइ गएन अउर अउतय मनोहर से पूछे, का हो ! कइसन बहुत टेंशनियाय गए हौ? मनोहर…. हे मनोहर, दुइ बार बुलावय के मनोहर मानो नींद से जागे, अउर हड़बड़ाय के बोले, का भइया, का भवा। का भवा… अरे कब से बोलावत हई अउर तू हयऽ कि उपड़ौर की नइया बइठा अहा। मनोहर बड़ी लंबी सांस लइके बोले, का बताई भइया, कल तहसील गए रहे, उहै नारे पार वाले खेतवा के तारीख रही। हां तो का होइ गा? अरे कुछ नही छोड़व जाए देव रामहित…..अरे अइसे वैâइसे छोड़व, जवन भी परेशानी होय खुलिके बताओ, रच्चउ टेंशन जिन लेव, आखिर तोहार दुख दरद हमार अउर हमार दुख दरद तोहार। हां उ तो ठीक है पर यहिमा दुख दरद कहां आइ गवा..! तो जब कउनउ दुख दरद नही है तो काहें गउखा जइसन मुंह लटकाए बइठे हौ? अरे कुछ खास नहीं बस उहै कल तहसील से आवत रहे। आवत की रोडवेज के बस पकड़े अउर उही बस में हमरे बगले एक बहुतै नीक मेहरारू आइके हमरे बगले बइठ गय। हां तो का होइ गवा, का किहिस उ मेहरारू? अरे रामहित पहिले तो उ हमार अंगुरी पकड़ेस, फिरि… फिरि का ओकरे बाद, हमार गदोरी छुईस, फिर…फिर हमार हाथ अपने हाथ में गतरि लिहस। फिर का भवा? अब धीरे-धीरे रामहित के भी मनोहर की बात मा मजा आवै लागि। अरे फिर का बताई रामहित… फिर ओहिके हाथ हमरे कान्हे पे आइ गवा….फिर का हम थोड़ा खिसकी गए। फिर का भवा? अरे आगे बोलो यार तुम्हरी चाल केतनी धीमी है। आगे का बोली रामहित, उ हमरी आंखिन में आपन आंखि डारि के मुस्कियात रही तब तक ओकर स्टॉप आइ गवा। लेकिन जाए के पहिले उ हमरा हाथ में एक कागज पकड़ाय के चली गय। का लिखा रहा ओहि कागज में? कुछौ नहीं यार जबसे उ कागज पढ़ें हैं तबसे दिमाग के दहिसर होइ गवा है। आखिर अइसन का लिखा रहा?…. ओहमा लिखा रहा कि ‘मर्दाना कमजोरी के लिए तत्काल मिलें’ डॉ. गुलाटी। इहै लिखा कागज पकड़ाय के उ उतरि गय।
