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रुख-ए-सियासत : पर्दे के पीछे की दोस्ती, मंच पर दुश्मनी… पश्चिम यूपी की सियासत का नया व्याकरण

तौसीफ कुरैशी

पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा सीधी रेखा में नहीं चलती। यहां चुनावी मौसम आते ही रास्ते बदलते हैं, रिश्ते बदलते हैं और बयान बदल जाते हैं। जो नेता मंच से एक-दूसरे पर सबसे तीखे हमले करते दिखाई देते हैं, वही कभी-कभी बंद कमरों में मुस्कुराते हुए भविष्य की रणनीति तय करते मिल जाते हैं। यही राजनीति का वह चेहरा है, जिसे जनता अक्सर चुनाव परिणाम आने के बाद समझ पाती है, खासकर बंधुआ मजदूर। २०२७ के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी ऐसी ही चर्चाओं का बाजार गर्म है। पश्चिम उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जनपद के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि अपने विरोधियों को साधने, पुराने मुकदमों से राहत पाने और निजी हितों की सुरक्षा के लिए एक चर्चित नेता ने सत्ता पक्ष से भी संपर्क साध लिया है और डील भी कर ली है। सूत्रों की मानें तो पिछली गली से मुलाकातें भी हो चुकी हैं और वायदे-वहिद भी कि किसको वैâसे मात दी जाएगी। यह दावा कितना सच है, इसका पैâसला समय करेगा, लेकिन राजनीति में अफवाहें भी कई बार भविष्य की पटकथा लिख देती हैं। राजनीति का सबसे बड़ा सच शायद यही है कि यहां स्थायी दोस्त और स्थायी दुश्मन नहीं होते, केवल स्थायी हित होते हैं। जनता विचारधारा पर भरोसा करती है, लेकिन सत्ता के गलियारों में अक्सर विचारधारा से पहले राजनीतिक गणित बैठाया जाता है। मंच पर तलवारें खिंची रहती हैं और पर्दे के पीछे हाथ मिलते रहते हैं और बेचारी जनता अपने सियासी आका को भगवान का अवतार समझती है। इसी चर्चा के साथ एक और राजनीतिक संभावना हवा में तैर रही है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पश्चिम उत्तर प्रदेश की महत्वपूर्ण सीट नंबर एक बेहट से भी चुनाव लड़ने पर विचार कर सकते हैं या कर लिया है। यदि ऐसा होता है तो इसका उद्देश्य केवल एक सीट जीतना नहीं होगा, बल्कि पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के पक्ष में मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाना होगा। माना जा रहा है कि योगी गोरखपुर से तो चुनाव लड़ेंगे ही, लेकिन बेहट से उतरना क्षेत्रीय संदेश देने की रणनीति हो सकती है।
अगर यह राजनीतिक समीकरण सच साबित होता है, तो उस कथित नेता के लिए सबसे बड़ी चुनौती उसकी अपनी पार्टी के भीतर खड़ी हो सकती है। क्योंकि राजनीति में पर्दे के पीछे के रिश्ते देर-सबेर सामने आ ही जाते हैं और जब कार्यकर्ताओं को यह अहसास होता है कि नेतृत्व की लड़ाई केवल मंच तक सीमित थी, तब सबसे पहले भरोसा टूटता है। वैसे भी उस नेता का राजनीतिक सफर किसी एक दल की निष्ठा से अधिक दल-बदल की कहानियों से पहचाना जाता रहा है। उनके आलोचक कहते हैं कि वे जहां जाते हैं, वहां संगठन कमजोर हो जाता है और उनका निजी प्रभाव मजबूत हो जाता है। टिकट वितरण से लेकर चुनावी संसाधनों तक, उनके तौर-तरीकों पर सवाल पहले भी उठते रहे हैं। आरोप यह भी लगते रहे हैं कि राजनीति उनके लिए जनसेवा से अधिक निजी समीकरणों का माध्यम बन गई है, लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि अंतिम पैâसला न बंद कमरों में होता है और न ही राजनीतिक अफवाहों से। पैâसला जनता करती है। जनता देर से समझती है, लेकिन जब समझती है तो फिर बड़े-बड़े राजनीतिक गणित धरे रह जाते हैं। पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजनीति आज फिर उसी मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां पर्दे के पीछे की दोस्ती और मंच पर दिखाई जाने वाली दुश्मनी दोनों की असली परीक्षा २०२७ में होगी।
दुनिया जिनको सौंप रही है अपनी अर्थव्यवस्था…उन्हें हमने `देशद्रोही’ कहकर खो दिया
किसी देश की सबसे बड़ी पूंजी उसका सोना, विदेशी मुद्रा भंडार या ऊंची-ऊंची इमारतें नहीं होतीं। उसकी सबसे बड़ी ताकत उसके विचार, उसकी प्रतिभाएं और उन्हें सम्मान देने की संस्कृति होती है। जब कोई राष्ट्र अपने मेधावी लोगों को संदेह की नजर से देखने लगे और दुनिया उन्हें सिर-आंखों पर बिठाए, तब सवाल केवल व्यक्तियों का नहीं, व्यवस्था के आत्मविश्वास का भी होता है। खबर है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने अपनी अर्थव्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण सलाहकार समूह में जिन विशेषज्ञों को जगह दी है, उनमें भारतीय मूल के अर्थशास्त्री और पेशेवर भी शामिल हैं। यदि यह तथ्य सही है, तो यह नि:स्संदेह भारतीय प्रतिभा की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है। लेकिन इसके साथ ही एक असहज प्रश्न भी खड़ा होता है कि क्या हम अपने प्रतिभाशाली लोगों का सम्मान उतना ही कर पाते हैं, जितना दुनिया करती है? डॉ. रघुराम राजन इसका सबसे चर्चित उदाहरण हैं। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर के रूप में उन्होंने कई बार अर्थव्यवस्था को लेकर ऐसी चेतावनियां दीं, जो उस समय राजनीतिक बहस का विषय बन गर्इं। उनके विचारों से असहमति हो सकती है, लेकिन किसी अर्थशास्त्री का मूल्यांकन उसकी पेशेवर क्षमता से होना चाहिए, राजनीतिक निष्ठा से नहीं। दुनिया उन्हें एक गंभीर अर्थशास्त्री मानती है। भारत में उन्हें कई बार राजनीतिक आरोपों का सामना करना पड़ा। यही बात प्रोफेसर राज चेट्टी और आशा शर्मा जैसे भारतीय मूल के पेशेवरों पर भी लागू होती है। दुनिया की बड़ी संस्थाएं उन्हें इसलिए चुनती हैं क्योंकि वे ज्ञान, शोध और प्रबंधन की क्षमता रखते हैं। वहां नियुक्ति का आधार योग्यता होती है, नारे नहीं। भारत ने भी विश्वस्तरीय अर्थशास्त्री दिए हैं। अमर्त्य सेन से लेकर रघुराम राजन तक और अनेक नाम इस सूची में हैं। प्रश्न यह नहीं कि वे सरकार से सहमत हैं या असहमत। प्रश्न यह है कि क्या लोकतंत्र में विशेषज्ञों की स्वतंत्र राय को स्थान मिलेगा या हर असहमति को विरोध मान लिया जाएगा? यह भी उतना ही सच है कि किसी एक व्यक्ति को देश की सारी आर्थिक सफलताओं या विफलताओं का कारण मान लेना उचित नहीं होगा।
अर्थव्यवस्था अनेक नीतियों, वैश्विक परिस्थितियों, संस्थागत निर्णयों और राजनीतिक नेतृत्व के सम्मिलित प्रभाव से चलती है। इसलिए किसी भी पक्ष का मूल्यांकन तथ्यों और परिणामों के आधार पर होना चाहिए, भावनाओं या व्यक्तिपूजा के आधार पर नहीं। राष्ट्र का आत्मविश्वास सत्ता की ताकत से नहीं, समाज की बौद्धिक ईमानदारी से बनता है। आज वही कसौटी हमारे सामने है। क्या हम अपने विद्वानों से सवाल पूछेंगे, उनसे सीखेंगे और उन्हें सम्मान देंगे? या फिर उन्हें तब याद करेंगे, जब कोई दूसरा देश उनकी प्रतिभा का सम्मान करेगा? गर्व इस बात का होना चाहिए कि भारतीय मस्तिष्क दुनिया का नेतृत्व कर रहे हैं। लेकिन उससे भी बड़ा गर्व तब होगा, जब भारत अपनी प्रतिभाओं को पहचानने, उनसे असहमति के बावजूद उनका सम्मान करने और नीति निर्माण में उनकी विशेषज्ञता का उपयोग करने की परिपक्वता भी दिखाएगा। तभी सचमुच कहा जा सकेगा कि भारत केवल प्रतिभाएं पैदा नहीं करता, उन्हें संजोना भी जानता है।

सत्यमेव जयते

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