हिमांशु राज
अयोध्या के राम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण से जुड़ा विवाद अब सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कानूनी नोटिस, उसके जवाब और उनकी अलग-अलग व्याख्याओं के जरिए उत्तर प्रदेश की सियासत का नया विस्फोटक अध्याय बन गया है। भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे ने जिस पोस्ट के जरिए चढ़ावा चोरी मामले के आरोपी रमाशंकर उर्फ टिन्नू यादव को समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव से जोड़ने की कोशिश की, उसी पोस्ट से शुरू हुआ तनातनी अब भाजपा और सपा के बीच प्रतिष्ठा की जंग में बदल चुका है।
समाजवादी पार्टी की ओर से भेजे गए मानहानि नोटिस के जवाब में निशिकांत दुबे के वकील ने चार पन्नों के पत्र में आरोपों को बेबुनियाद और तथ्यों से परे बताया, लेकिन अंत में यह भी लिख दिया कि अगर उनके किसी बयान से अनजाने में किसी की भावना आहत हुई हो तो वे खेद प्रकट करते हैं और माफी मांगते हैं। सपा की समाजवादी अधिवक्ता सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्ण कन्हैया पाल ने इसी पैरा-९ को दुबे की लिखित माफी करार देते हुए जनता के सामने पेश किया और दावा किया कि कानूनी रूप से यह स्वीकृति है कि टिप्पणी अनुचित थी। दूसरी ओर, दुबे ने सार्वजनिक रूप से साफ कहा कि न उन्होंने अखिलेश यादव से माफी मांगी है, न ही कोई गलती स्वीकार की है, बल्कि उनकी माफीनामा भाषा को केवल औपचारिक कानूनी शिष्टाचार बताया जा रहा है। यही दोहरी व्याख्या इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक रोचक और सियासी तौर पर गर्म बना रही है।
राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में एघ्ऊ की जांच के बीच टिन्नू यादव समेत आठ आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है और कॉल डिटेल्स को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं, जिनके सहारे भाजपा खेमे के कुछ नेता अखिलेश पर राजनीतिक निशाना साध रहे हैं, जबकि सपा इसे षड्यंत्र और चरित्र हनन की साजिश बता रही है। खुद अखिलेश यादव ने शुरू से ही इस पोस्ट को झूठा और मानहानिकारक बताते हुए निशिकांत दुबे को चेतावनी दी थी कि १० मिनट के भीतर पोस्ट न हटाई गई तो नामजद एफआईआर कराई जाएगी, साथ ही जिन्होंने यह पोस्ट साझा की है, उनसे सार्वजनिक माफी की मांग भी की गई थी। दुबे ने जवाब में खुद को सिर्फ ‘सवाल पूछने वाला’ बताते हुए १९९० में रामभक्तों पर गोली चलाए जाने की पुरानी घटना उठाई और नया राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की, मगर अंतत: उनके कानूनी जवाब में दर्ज खेद और माफी की पंक्तियों ने सियासी जमीन पर उनका बचाव कमजोर कर दिया।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह पूरा प्रकरण अखिलेश यादव को विपक्षी खेमे में एक आक्रामक और कानूनी दांव खेलने वाले नेता के रूप में स्थापित करता दिख रहा है। नोटिस की टाइमिंग से लेकर ‘१० मिनट अल्टीमेटम’ जैसी भाषा ने न सिर्फ सपा के कोर वोटर को संदेश दिया कि उनका नेतृत्व कमजोर नहीं है, बल्कि भाजपा पर भी यह नैरेटिव थोपा कि राम मंदिर जैसे भावनात्मक मुद्दे पर तथ्यहीन आरोप लगाने की हिम्मत विपक्ष नहीं, सत्ता पक्ष दिखा रहा है। उधर, दुबे भले ही अपने जवाब को माफी नहीं मान रहे हों, लेकिन लिखित रूप से ‘रेग्रेट’ और ‘अपॉलजी’ का जिक्र भाजपा की आक्रामक राजनीति के लिए एक मनोवैज्ञानिक बैकफुट जैसा है, जिसे सपा और अन्य विपक्षी दल चुनावी मौसम में बार-बार पेश करेंगे। उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीति में जहां राम मंदिर को भाजपा अपनी नैतिक पूंजी मानती रही है, वहीं इसी मंदिर के चढ़ावे को लेकर उठे सवाल और आरोप अब भाजपा को स्पष्टीकरण की मुद्रा में ला रहे हैं और अखिलेश जैसे नेता को ‘सवाल पूछने वाले’ की जगह ‘जवाब लेने वाले’ की पोजीशन में खड़ा कर रहे हैं। यही कारण है कि कानूनी नोटिस के एक ही पत्र से निकली दो विपरीत व्याख्याओं के बीच फिलहाल जमीन पर बढ़त अखिलेश यादव के खाते में जाती दिखती है, क्योंकि उन्होंने न केवल अपनी छवि की रक्षा के लिए कानून का सहारा लिया, बल्कि भाजपा की कथित नैतिक बढ़त को भी चुनौती दी; आगे आने वाले महीनों में यह प्रकरण यूपी की राजनीति में सपा के लिए प्रचार और भाजपा के लिए बचाव का स्थायी मुद्दा बन सकता है।
