धीरज फूलमती सिंह
लड़-झगड़कर मुंह फुलाकर अलग-थलग होकर बैठ जाना अथवा अपने-अपने रास्ते चल देना किसी भी समस्या का हल नहीं होता। समस्या का समाधान आपस में मिल-बैठकर किया जाता है यानी कोशिश यही रहनी चाहिए कि बातचीत का रास्ता कभी बंद न हो। बातचीत अक्सर किसी रिश्ते में तनाव, नाराजगी या मतभेदों के कारण बंद होती है। यदि संभव हो तो सामने वाले व्यक्ति से सीधे पूछना चाहिए कि क्या हुआ है? और उन्हें अपनी बात रखने का मौका दिया जाना चाहिए। बातचीत बंद होने पर उसे फिर से शुरू करना या उसे खत्म करना मनुष्य की स्थिति और सामने वाले व्यक्ति के साथ उसके संबंधों पर निर्भर करता है। जब परिवार में कोई सदस्य बातचीत बंद कर देता है तो यह तनावपूर्ण हो सकता है।
संबंधों में कितनी भी कटुता क्यों न आ जाए उनसे किनारा नहीं किया जा सकता। देर-सवेर उन्हें सुधारना ही पड़ता है। बाद में यही कहकर उन्हें भूलना होता है कि पुरानी बातों पर मिट्टी डालो और उन्हें भूल जाओ। समाज में, अपने आस-पड़ोस में, अपने कार्यक्षेत्र में यानी हर स्थान पर यदाकदा मनमुटाव हो जाते हैं। हर व्यक्ति के विचार, उसकी सोच, उसके कार्य करने का तरीका सब अलग-अलग होते हैं। इसलिए ऐसा होना स्वाभाविक होता है। दो लोगों या समूहों में भी यदि कभी झगड़े की स्थिति बनती है और थाना-पुलिस अथवा कोर्ट-कचहरी में जाने की नौबत आ जाती है तब भी अंतत: दोनों पक्षों को आपस में हाथ मिलाकर ही मुक्ति मिलती है।
अपने घर में बच्चों के झगड़े होते ही रहते हैं। तब हम उन्हें गले मिलवाकर एक-दूसरे को सॉरी कहलवा देते हैं, यानी कि उनमें समझौता ही करवाते हैं। उन्हें हम यही शिक्षा देते हैं कि झगड़ा मत करो, प्यार से रहो, गलती हो जाये तो माफी मांग लो और मिलकर रहो। बच्चों को भी हम सीख दे देते हैं। हम बड़ों को भी इसी नियम का पालन करना चाहिए पर जब हम बड़ों की बारी आती है तो हमारा अहम आड़े आ जाता है। हम दूसरों को दी हुई अपनी ही सीख को भूलकर अक्खड़ या हठी बन जाते हैं। बच्चे यदि हमारी बात को अनसुनी करना चाहते हैं तो उन्हें डपटकर, हम अपनी बात मनमवाते हैं, पर उनके समक्ष स्वयं क्या उदाहरण रखते हैं? अपना व्यवहार ऐसा रखना चाहिए कि उससे किसी का अहित न हो। बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रखना चाहिए। अपनी हठधर्मिता को त्यागकर और मिल-बैठकर सदा ही सकारात्मक समझौते होते हैं।
