फिर भी बाकी है बेशर्मी…
अरुण कुमार गुप्ता
नीट परीक्षा में गड़बड़ी के लिए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को जिम्मेदार मानते हुए प्रसिद्ध पर्यावरणविद, शिक्षाविद और वैज्ञानिक सोनम वांगचुक ने २८ जून से दिल्ली के जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल शुरू की। भूख हड़ताल के १६ वें-१७वें दिन देश की नाकारा मोदी सरकार ने तानाशाही दिखाते हुए वांगचुक को उठवा लिया, लेकिन इस दौरान पूरा गोदी मीडिया खामोश रहा। उधर पहले से ही घोषित २० जुलाई को संसद मार्च में शामिल हजारों छात्रों पर दिल्ली पुलिस ने बर्बरता से लाठियां चलाईं। बावजूद इसके गोदी मीडिया सच्चाई दिखाने के बजाय छात्रों को ही देश विरोधी साबित करने में जुट गया, लेकिन गोदी मीडिया के खिलाफ जो छात्रों का गुस्सा फूट रहा है उसे समझिए।
रीमिक्स के जरिए विरोध
अब जंतर-मंतर पर छात्र रीमिक्स के जरिए लाठीचार्ज का विरोध कर रहे हैं तो कोई रीमिक्स के जरिए।
पुलिस वाले बाबू मुझे डंडा लगा दो। दिल से जो आवाज उठी उसे वैâसे भी दबा दो। डीजे का वॉल्यूम बढ़ा दो। न हम रुकने वाले न तुम झुकने वाले। मूनलाइट के नीचे हम ही हैं आवाज उठाने वाले।
गोदी न्यूज चैनलों पर
फूट रहा गुस्सा
जो गोदी मीडिया के पत्रकार, एंकर ईरान-इजरायल युद्ध को कवर करने के लिए इजराइल पहुंच गए थे, वे आज कहां हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा छात्रों का आंदोलन उन्हें क्यों नजर नहीं आ रहा है। इतनी बेशर्मी। उल्टे इन छात्रों का कनेक्शन पाकिस्तान से जोड़ दिया। क्या अपना देश इतना कमजोर है कि पाकिस्तान इतनी दूरी से आंदोलन को हैंडल कर रहा है और ५६ इंच का सीना सिर्फ कागजी शेर बनकर रह गया है। जंतर-मंतर पर छात्र गोदी मीडिया के रिपोर्टर का स्वागत जूते की माला पहनकर करने पर विवश हैं। एसी स्टूडियो में बैठकर मोदी की डफली बजाने वाले न्यूज चैनलों के एंकर सुधीर, अमित, चित्रा, अंजना, रुबिका, अमित का स्वागत करने के लिए भी छात्र तैयार हैं, लेकिन शर्म तो हमें आती नहीं।
बदल रही तस्वीर
अब बात कर लेते हैं वरिष्ठ पत्रकार दिवांग की। वे कहते हैं कि निजी न्यूज चैनल आज तक की लांचिंग के समय से वे जुड़े थे। उन्होंने कहा कि उन्हें बहुत दुख होता है कि हम कहां से कहां पहुंच गए। जिस तरह आंदोलन की कवरेज हुई उससे लोग काफी नाराज हैं। लोगों की उम्मीदों को तोड़ा जा रहा है। लोगों को उम्मीद रहती है कि विश्वसनीयता बनी रहनी चाहिए, लेकिन…
पापा भी नहीं बचा पाए
जंतर-मंतर पर जिस तरह गोदी मीडिया के रिपोर्टरों को आंदोलनकारी खदेड़ रहे हैं, सवालों की झड़ी लगा रहे हैं, जूतों की माला पहनाकर गजब बेइज्जती कर रहे हैं। उस बेइज्जती से पो पो यानी पापा भी नहीं बचा पा रहे हैं।
