मन मारकर ही सही, लेकिन विश्वविराजमान मौनी नरेंद्र बाबा ने आखिरकार पेपर लीक पर दो शब्दों का प्रवचन झाड़ ही दिया है। ‘नीट’ पेपर लीक पर प्रधानमंत्री मोदी के दरवाजे पर ही गुस्से का बवंडर उठ खड़ा हुआ है। उसकी तपिश महसूस होते ही मोदी कहते हैं, ‘देश के विद्यार्थियों का हित और भविष्य प्राथमिकता है। वह भी सर्वोच्च प्राथमिकता है।’ मोदी की बातों में ढोंग का भूसा भरा होता है। इसलिए मौन में तेज वगैरह होने की संभावना तो थी ही नहीं। देशभर में जनता के सड़कों पर आने से उनकी नाक दब गई और फिर उन्हें मुंह खोलकर हवा छोड़नी पड़ी। मोदी आगे कहते हैं, ‘पेपर लीक मामले में दोषियों को सख्त सजा देने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना करेंगे। छात्रों के भविष्य से खेलनेवाले किसी भी शख्स को बख्शा नहीं जाएगा,’ ऐसी ‘धमकी’ भी मोदी ने दी है। यह धमकी देने में आपको इतना वक्त क्यों लगा? पिछले दो महीनों से दिल्ली के ‘जंतर-मंतर’ पर वरिष्ठ पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और ग़ुस्साए छात्रों ने पेपर लीक मामले को लेकर एलान-ए-जंग कर रखा है। पुलिस की लाठियां खाते हुए छात्र ‘आर या पार’ की लड़ाई पर उतर आए हैं। देशभर से इस आंदोलन को समर्थन मिल रहा है। उसी के खौफ से संसद में
एक शब्द न निकालने वाले
प्रधानमंत्री ने ‘एक्स’ सोशल मीडिया का अपना हमेशा का रास्ता चुना। यानी यहां भी उन्होंने अपना अहंकार बनाए ही रखा। आंदोलनकारी छात्रों से संवाद कायम करके उन्होंने कुछ किया होता तो प्रधानमंत्री की बात पर ऐतबार किया जाए, ऐसा छात्रों और जनता को लगता। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेकर उन्होंने ‘फास्ट ट्रैक’ का एलान किया होता तो उनकी बात में कोई वजन होता। लेकिन वैसा कुछ भी नहीं हुआ। इसलिए मोदी का आश्वासन ‘हवा के बुलबुले’ ही साबित हुआ है। आंदोलनकारी छात्रों की इस पर प्रतिक्रिया काफी कुछ बयां करनेवाली है। ‘पेपर लीक पर मरहम-पट्टी’ जैसे शब्दों में उन्होंने मोदी के एलान का मजाक उड़ाया है और वह बिल्कुल सही भी है, क्योंकि मोदी अपना वादा निभाएंगे, इसकी गारंटी किसी को नहीं है। अपने १२ वर्षों के कार्यकाल में देश के ज्वलंत मुद्दों पर वे या तो मौन रहे या अपने आश्वासनों पर उन्होंने खुद ही पानी फेर दिया। पेपर लीक मामले में असली मुद्दा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का और शिक्षा की भ्रष्ट व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का है। लेकिन उस पर एक लफ्ज न बोलते हुए प्रधानमंत्री ‘फास्ट ट्रैक’ का सब्जबाग दिखा रहे हैं। जिम्मेदार लोगों को कड़ी सजा वगैरह देने के
गुब्बारे छोड़ रहे
हैं। उनके इन वादों पर यकीन वैâसे करें? पेपर लीक की जिम्मेदारी शिक्षा मंत्री के नाते धर्मेंद्र प्रधान की ही है, यह बात क्या प्रधानमंत्री को मालूम नहीं है? मालूम है, फिर भी उन्होंने न उस पर ‘चूं’ तक की और न ही उनका इस्तीफा लेने की हिम्मत वे दिखा पा रहे हैं। मोदी के राज में १५२ पेपर लीक हुए, लेकिन किसी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब १५३वें पेपर लीक पर उन्हें मुंह खोलना ही पड़ा, क्योंकि ‘कॉकरोचों’ की तरफ से सुलगाई गई आग की लपटें सीधे उनके बंगले तक पहुंच गईं। देशभर के जनाक्रोश के चलते उनकी नाक दब गई। अलबत्ता, पिछले दस सालों में आपकी खामोशी से छात्रों के भविष्य की जो तबाही हुई, उसका क्या? लाखों छात्रों और उनके मां-बाप के सपनों के चकनाचूर होने का क्या? आप एक तरफ सख्त कार्रवाई का दिलासा दे रहे हैं और दूसरी तरफ दिल्ली में ‘राष्ट्रीय सुरक्षा कानून’ का बुलडोजर चला रहे हैं। जनता आपकी बातों पर यकीन वैâसे करे? पेपर लीक मामले में जनाक्रोश की वजह से आपका ‘मौनभंग’ तो हुआ, लेकिन आपका यह दिलासा सिर्फ मुंह की भाप (सिर्फ लफ्फाजी) ही साबित होनेवाला है, यह जनता भी अच्छी तरह जानती है!
