सैयद सलमान / मुंबई
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी विशाल जनभागीदारी रही है। जब-जब देश में चुनावों की रणनीति का गुणा-भाग किया जाता है, तब-तब विभिन्न सामाजिक वर्गों की राजनीतिक भूमिका को लेकर मंथन और तेज हो जाता है।
एक बड़ी भूल
हालिया दौर में देश की लगभग बाईस करोड़ मुस्लिम आबादी की चुनावी प्रासंगिकता, उपेक्षा और उनके संभावित चुनावी बहिष्कार को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इस मुद्दे पर मुस्लिम बुद्धिजीवी, राजनीतिज्ञ और सियासी रसूखवाले उलेमा एक मंच पर इकट्ठा होकर रणनीति बनाने के लिए एक बैठक आयोजित कर रहे हैं। यह बहस सिर्फ एक समुदाय के विचार और निर्णय तक सीमित नहीं है, यह सीधे भारत के लोकतांत्रिक ढांचे और संवैधानिक मूल्यों के भविष्य से जुड़ी है।
राजनीतिक गलियारों और मीडिया जगत में मुस्लिम समाज को लेकर कई सतही धारणाएं बना ली गई हैं। एक तरफ उसे एकमुश्त वोट बैंक मान लिया जाता है तो दूसरी तरफ ऐसा प्रयास किया जाता है कि राजनीतिक उपेक्षा के चलते यह वर्ग पूरी प्रक्रिया से अलग-थलग हो जाए। ये दोनों ही नजरिए जमीनी हकीकत को पूरी तरह नहीं समझते। भारतीय मुस्लिम समाज किसी एक राजनीतिक सोच से बंधा हुआ वर्ग नहीं है। इसमें भी क्षेत्रीय, आर्थिक, भाषाई और सामाजिक विविधताएं उतनी ही गहरी हैं, जितनी देश के किसी अन्य वर्ग में। ऐतिहासिक रूप से इस समाज ने देश की लोकतांत्रिक यात्रा में लगातार अपनी भूमिका निभाई है। हाल-फिलहाल की ध्रुवीकरण वाली सियासत से मुस्लिम समाज बदजन है। मुस्लिम समाज के एक वर्ग का मानना है कि जब उनके वोट की अहमियत ही नहीं रही तो क्यों न चुनावों का बहिष्कार वाला रास्ता अपनाया जाए। चुनावी प्रक्रिया के प्रति निराशा या असंतोष के कारण लोकतंत्र से विमुख हो जाना एक बड़ी भूल है।
नुकसानदेह और अव्यावहारिक
चुनावों के बहिष्कार की चर्चा पर यदि निष्पक्षता से विचार करें तो यह साफ दिखता है कि वोट का बहिष्कार किसी समस्या का हल नहीं हो सकता। लोकतंत्र में जब कोई वर्ग अपने मताधिकार का प्रयोग करने से पीछे हटता है तो वह विरोध दर्ज कराने के बजाय खुद को राजनीतिक रूप से बेअसर बनाने का जोखिम उठाता है। चुनाव का बहिष्कार किसी व्यवस्था के लिए चुनौती नहीं बनता, यह सिर्फ एक ऐसा शून्य पैदा करता है जिसे दूसरे लोग आसानी से अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लेते हैं। हमारी व्यवस्था में चुप्पी या अनुपस्थिति को विरोध के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता। यहां केवल वही आवाज असर दिखाती है, जो ईवीएम के जरिए दर्ज होती है।
मुस्लिम समाज को समझना होगा कि मताधिकार सिर्फ किसी दल को चुनने का जरिया मात्र नहीं है। यह संविधान द्वारा दिए गए नागरिक अस्तित्व और समानता की सबसे बड़ी गारंटी है। किसी भी देश में अपनी चिंताओं को दूर करने का रास्ता व्यवस्था से बाहर जाने में नहीं, उसके भीतर रहकर अपनी ताकत दिखाने में है। वोट न देने का निर्णय अंतत: उन शक्तियों को ही फायदा पहुंचाएगा, जो लोकतांत्रिक विविधता को कमजोर करना चाहती हैं और धीरे-धीरे तानाशाही की तरफ कदम बढ़ा रही हैं इसलिए बहिष्कार का विचार तात्कालिक तौर पर भले आकर्षक लगे, लेकिन लंबे समय के हितों के लिहाज से यह बेहद नुकसानदेह और अव्यावहारिक साबित होता है।
सशक्त हथियार का इस्तेमाल
मुस्लिम समाज को हक है कि वह अपनी सियासत की दशा और दिशा पर मंथन करे। राजनीतिक चर्चाओं में अपने लिए बने भ्रम और गलतफहमियों को दूर करे। दरअसल, समाज के समक्ष असली चुनौती वोट देने या न देने की नहीं है, बल्कि अपने वोट को अधिक जागरूक और मुद्दे-आधारित बनाने की है। दशकों से चले आ रहे भावनात्मक मुद्दों और भय के माहौल से बाहर निकलकर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, आर्थिक मजबूती और नागरिक सुरक्षा जैसे बुनियादी विषयों पर उसे ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। मताधिकार का प्रयोग किसी के अंध-विरोध या अंध-समर्थन के आधार पर होने के बजाय संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा और जवाबदेही तय करने के लिए होना चाहिए।
लोकतंत्र किसी एक चुनाव तक सीमित नहीं होता। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसमें प्रत्येक नागरिक की मौजूदगी जरूरी है। तमाम समस्याओं, उपेक्षाओं और राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद लोकतांत्रिक संस्थाओं, संविधान और अपनी नागरिक क्षमता पर विश्वास बनाए रखना ही एकमात्र तार्किक रास्ता है। मुस्लिम समाज के लिए चुनावों से दूरी बनाना किसी समस्या का समाधान नहीं है, यह तो मुश्किलों को और बढ़ानेवाला कदम है। लोकतंत्र में किसी भी नागरिक का सबसे सशक्त हथियार उसका वोट है और उस हथियार को खुद ही छोड़ देना समझदारी नहीं कही जा सकती। देश के बेहतर भविष्य का निर्माण, अधिकारों की रक्षा और एक बराबरी वाले समाज की स्थापना सिर्फ और सिर्फ लोकतांत्रिक भागीदारी के जरिए ही संभव है। जब भी चुनाव आएं, मताधिकार का समझदारी से किया गया प्रयोग ही समाज की वास्तविक शत्तिâ और चेतना को साबित करेगा। मुस्लिम समाज को यह बात समझने की खास जरूरत है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
