मुख्यपृष्ठनए समाचारमुंबई मसाला: सत्ता की वैन के आगे चट्टान बनी बेटी!

मुंबई मसाला: सत्ता की वैन के आगे चट्टान बनी बेटी!

-छात्रों की आवाज दबाने निकली पुलिस के सामने डटकर खड़ी हुई रिया

-पुलिस गाड़ी से टकराया लोकतंत्र का साहस!

जेदवी / मुंबई

मुंबई ने एक बार फिर ऐसा दृश्य देखा, जिसने सत्ता की सख्ती और लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा, दोनों को एक ही तस्वीर में समेट दिया। दादर के शिवाजी पार्क में नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन कर रहे छात्रों को पुलिस वैन में भरकर ले जाया जा रहा था। तभी २७ वर्षीय रिया अहीर अचानक पुलिस वैन के सामने डटकर खड़ी हो गईं। यह महज कुछ मिनटों का विरोध नहीं था, बल्कि उस आक्रोश की आवाज थी, जिसे दबाने की कोशिश लगातार की जा रही है।
देश का युवा अपने भविष्य, पारदर्शी परीक्षा व्यवस्था और न्याय की मांग कर रहा है, लेकिन जवाब में उसे संवाद नहीं, बल्कि लाठियां, हिरासत और मुकदमों का सामना करना पड़ रहा है। सवाल यह है कि आखिर सरकार छात्रों से इतनी भयभीत क्यों दिखाई दे रही है? क्या अपने भविष्य के लिए आवाज उठाना अब अपराध बन चुका है?
रिया अहीर ने बताया कि छात्रों को जिस तरह पुलिस वैन में ठूंसकर ले जाया जा रहा था, वह दृश्य देखकर वह खुद को रोक नहीं सकीं। उनकी यह हिम्मत आज लाखों युवाओं की भावना का प्रतीक बन गई है। एक निडर बेटी ने सत्ता को यह एहसास करा दिया कि अन्याय के सामने खामोश रहना भी अन्याय का साथ देना है।
करीब ४०० लोगों पर एफआईआर, सार्वजनिक जमावड़े पर रोक और विरोध करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई यह सवाल खड़ा करती है कि क्या लोकतंत्र में असहमति जताने की भी अब कीमत चुकानी पड़ेगी? यदि छात्र परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं तो सरकार का पहला कर्तव्य संवाद होना चाहिए, दमन नहीं।
इतिहास गवाह है कि जब-जब सरकारों ने सवाल पूछने वालों को डराने की कोशिश की, तब-तब विरोध और मजबूत होकर उभरा। दादर की सड़क पर पुलिस वैन के सामने खड़ी रिया अहीर केवल एक युवती नहीं थीं बल्कि उस पीढ़ी का चेहरा थीं, जो अपने भविष्य का सौदा होते हुए चुपचाप देखने को तैयार नहीं है। लोकतंत्र में डंडे नहीं, संवाद चलता है। अब यह फैसला सरकार को करना है कि वह युवाओं की आवाज सुनेगी या उसे दबाने की कोशिश में लोकतांत्रिक मूल्यों को और कमजोर करेगी।
अकेली बेटी हजारों पर भारी
मुंबई की इस घटना ने यह साबित कर दिया कि युवाओं की आवाज को पुलिस वैन में बंद नहीं किया जा सकता। एक अकेली बेटी का साहस हजारों नारों पर भारी पड़ गया। सत्ता चाहे जितनी ताकत दिखा ले, लेकिन जागे हुए युवाओं की चेतना को हथकड़ियों में वैâद नहीं किया जा सकता।

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