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नोटबंदी का दबा हुआ गुस्सा बाहर आया है!

दिल्ली के आंदोलन की भीड़ में एक ऐसा शख्स मिला, जिससे संजय राऊत ने पूछा, ‘आप कहां से आए हैं?’ तो उसने कहा, ‘मैं बिहार से हूं, लेकिन मध्य प्रदेश में रहता हूं।’ वह कोई छात्र नहीं, बल्कि मध्यम उम्र का युवक था। जब उससे पूछा गया कि वह क्यों आया है, तो उसने बताया, ‘मेरा कारोबार ठीक चल रहा था, लेकिन नोटबंदी के दौरान मेरा धंधा और रोजी-रोटी तबाह हो गई। मैं उसी गुस्से का इजहार करने आया हूं।’ ‘यानी फिलहाल जो आंदोलन चल रहा है, उसे आप एक जरिया कह सकते हैं, लेकिन असल में पिछले कुछ सालों का दबा हुआ गुस्सा अब बाहर आ गया है,’ उद्धव ठाकरे कहते हैं।

कोर्ट के पास कबूतरों और कुत्तों पर ध्यान देने का वक्त है! … उद्धव ठाकरे का ज्वलंत सवाल
चंद्रचूड़ ने न्यायदेवी की आंखों हटाई थी पट्टी,
क्या वह फिर बांध ली है?

दिल्ली में मुझे कुछ लड़कियां मिलीं। उनके जज्बात बहुत गुस्से से भरे थे। ‘हमारे कपड़े फाड़े गए, बेरहमी से मारा-पीटा गया। लाठियों-डंडों पर जंग लगे कील लगाकर मारा गया, सर फोड़ दिए गए। एक लड़की की हालत तो बेहद नाजुक हो गई।’ इतना जुल्म हो रहा है और इस मामले पर ध्यान देने का वक्त नहीं है, ऐसा अदालत कह रही है। अदालत के पास कबूतरों और कुत्तों पर ध्यान देने का वक्त है, लेकिन ‘कॉकरोच’ पर ध्यान देने का वक्त नहीं है, यह बदकिस्मती है। क्या देश की तरह अदालत की हालत भी धृतराष्ट्र जैसी हो गई है? आज हालत ऐसी आ बनी है जैसे द्रौपदी धृतराष्ट्र से न्याय मांग रही हो। बीच के दौर में चंद्रचूड़ ने न्यायदेवी की आंखों से पट्टी हटाई थी, क्या न्यायदेवी ने वह पट्टी फिर से बांध ली है?’ उद्धव ठाकरे ये सवाल करते हैं।
क्या बीजेपी ने ये गुंडे पाकिस्तान से मंगवाए हैं?
‘लोग आज अपनी बात कहना चाहते हैं। इतने सालों से जमा गुस्सा और असंतोष बाहर आ गया है। हम उसे एक रास्ता देने की कोशिश कर रहे हैं। यह करते हुए मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि बहुत से लोग इस असंतोष की चिंगारी को गलत मोड़ देने की कोशिश कर रहे हैं। पुलिस पर हमले की कोशिशें हो रही हैं। सादे कपड़ों में कुछ गुंडे आंदोलन में घुस रहे हैं। पुलिस की लाठियां इनके हाथों में वैâसे आईं? नाम का कोई बैच नहीं, शरीर पर कोई वर्दी नहीं। आंदोलन को कुचलने के लिए क्या बीजेपी ने ये गुंडे पाकिस्तान से मंगवाए हैं?’ यह कड़ा सवाल उद्धव ठाकरे ने दागा।
चुप मत बैठिए, आवाज उठाइए…ताकत दिखाइए
‘सरकार जब ऐसी गुंडागर्दी चला रही हो, तो किसी को भी चुप नहीं रहना चाहिए। हर किसी को आवाज उठानी चाहिए और अपनी बात रखने तथा दिल के असंतोष को बाहर निकालने के लिए ही हमें घरों से बाहर निकलना है। देश की ताकत क्या होती है, यह दिखाने के लिए यह मोर्चा है। यह मोर्चा शिवतीर्थ से शुरू होकर सिद्धिविनायक मंदिर तक जाएगा। वहां जाकर हम दो काम करेंगे। एक ‘भगवान इस सरकार को सद्बुद्धि दे’ कहेंगे या फिर ये दुआ मांगेंगे कि ‘देश पर सरकार के रूप में आई इस मुसीबत को जल्द से जल्द दूर करे।’ ऐसा उद्धव ठाकरे ने कहा।
‘अगर विपक्ष छात्रों के कंधों पर बंदूकें रख रहा है तो आप छात्रों के सीने पर बंदूकें क्यों तान रहे हैं?’ उद्धव ठाकरे ने देवेंद्र फडणवीस के बयान का जवाब देते हुए यह पलटवार किया। जंतर-मंतर आंदोलन का केंद्र बन गया है, लेकिन यह अब पूरे देश की भावना बन चुकी है। इसीलिए मैंने ‘एक राष्ट्र, एक भावना’ कहा है। जो जहां है, उसे वहीं से अपना विरोध दर्ज कराना चाहिए। सभी लोग जंतर-मंतर नहीं पहुंच सकते। ग्रामीण इलाकों में भी आंदोलन हो रहे हैं। कई राज्यों के शहरों-शहरों में प्रदर्शन जारी हैं।
छात्रों का हुजूम बाहर निकल रहा है। कल का वीडियो देखा होगा, एक लड़की पुलिस की गाड़ी के आगे निडर होकर खड़ी हो गई। यह युवाओं की ताकत है। इन युवाओं को कॉकरोच कहा गया, लेकिन इसी ताकत से अब सरकार डर गई है। आप कितनी भी दमनकारी नीति अपना लें, अब देश खौफ के पार जा चुका है,’ उद्धव ठाकरे ने ललकारते हुए कहा।
कपड़े फाड़कर क्या हासिल होगा?
‘मारो, मारो’ कहते हुए पुलिस के डंडों से न डरनेवाला लड़का हमारे नागपुर का है। वह मुझसे मिला और बोला, ‘मार-मारकर क्या कर लेंगे, ऐसे जीने का भी क्या फायदा?’ यह उनका जज्बा है। इसलिए आंदोलनकारियों को मारकर, उनके कपड़े फाड़कर आपको क्या हासिल होगा… उनके दिल में क्या चल रहा है, उसे समझिए,’ उद्धव ठाकरे ने सरकार को सलाह दी।
‘दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा, ऐसा मोदी आज कह रहे हैं; लेकिन जिन लोगों ने इन छात्र-छात्राओं पर बेरहमी से लाठियां बरसाईं, जिन्होंने लड़कियों के कपड़े फाड़े, सादे कपड़ों में जो गुंडे वहां घुसाए गए, उन गुंडों को पकड़कर उन्हें भी सख्त सजा देने की जिम्मेदारी क्या मोदी ले रहे हैं? ये गुंडे किसने घुसाए थे? कौन लाया था और पुलिस की लाठियां उनके हाथों में कहां से आईं? क्या मोदी इन बातों के जवाब देंगे?’
‘प्रधानमंत्री ने आज एक ट्वीट किया है। सच कहें तो उन्हें खुद जाकर बच्चों से बात करने में कोई हर्ज नहीं था। इसमें कोई छोटा बनने की बात नहीं थी। हमारे अपने बच्चे हैं, हमारी अपनी जनता है; उनसे बात करने में हिचकिचाहट वैâसी? अगर पहले ही दिन सरकार ने बातचीत के दरवाजे खोल दिए होते तो यह नौबत न आती और आंदोलन इतना न खिंचता।’

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