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टीएमयू एग्रीकल्चर कॉलेज की डॉ. सुषमा सिंह का शोध पत्र प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल स्प्रिंगर नेचर में प्रकाशित

तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी की पर्यावरण विज्ञान की फैकल्टी डॉ. सुषमा सिंह ने उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में सौर, जल, पवन, बायोमास और भू-तापीय ऊर्जा की संभावनाओं, चुनौतियों तथा नीतिगत सुधारों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया।
तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज में पर्यावरण विज्ञान की फैकल्टी डॉ. सुषमा सिंह के नाम एक बड़ी उपलब्धि जुड़ गई है। डॉ. सुषमा का शोध पत्र “अनलॉकिंग रिन्यूएबल एनर्जी पोटेंशियल इन द वेस्टर्न हिमालयन स्टेट्स ऑफ इंडिया: अपॉर्च्युनिटीज एंड बैरियर्स” प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पब्लिशर स्प्रिंगर नेचर की शोध पत्रिका “एनवायरमेंटल साइंस एंड पॉल्यूशन” में प्रकाशित हुआ है।
इस शोध पत्र में डॉ. सिंह ने उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में सौर, जल, पवन, बायोमास तथा भू-तापीय ऊर्जा की संभावनाओं, चुनौतियों और नीतिगत सुधारों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया है। अध्ययन में पर्वतीय क्षेत्रों के लिए क्षेत्र-विशिष्ट और जलवायु-अनुकूल ऊर्जा नीतियों की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया है। यह शोध सतत विकास लक्ष्य-7 “सस्ती एवं स्वच्छ ऊर्जा” की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देगा। इस उपलब्धि से न केवल एग्रीकल्चर कॉलेज के पर्यावरण विज्ञान विभाग, बल्कि यूनिवर्सिटी को भी राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है।
डॉ. सिंह के शोध के अनुसार, देश के पश्चिमी हिमालयी राज्य—उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर—प्रचुर नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों से समृद्ध हैं। इसके बावजूद क्षेत्र-विशिष्ट बाधाओं के कारण इन संसाधनों का उपयोग उनकी क्षमता की तुलना में काफी कम है। इस ट्रेंड एडिटोरियल में तीन विश्लेषणात्मक आयामों—संसाधन उपलब्धता, उपयोग/तैनाती की व्यवहार्यता तथा जलवायु सहनशीलता—के आधार पर पांच नवीकरणीय ऊर्जा तकनीकों—सौर, जलविद्युत, पवन, बायोमास और भू-तापीय (जियोथर्मल)—का सरकारी आंकड़ों तथा सहकर्मी-समीक्षित शोध के आधार पर गहन विश्लेषण किया गया है।
“भारत के पश्चिमी हिमालयी राज्यों में नवीकरणीय ऊर्जा की क्षमता को उजागर करना: अवसर और बाधाएं” विषयक इस शोध पत्र से तीन प्रमुख निष्कर्ष सामने आए हैं। सौर ऊर्जा की सबसे अधिक अप्रयुक्त क्षमता अकेले जम्मू-कश्मीर में 111 गीगावाट है, लेकिन उत्तराखंड को छोड़कर इसका उपयोग नगण्य है। यह राज्य-स्तरीय नीतियों में असमानता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
जलविद्युत अभी भी प्रमुख नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत बना हुआ है। हिमाचल प्रदेश में 10.5 गीगावाट स्थापित क्षमता है, लेकिन ग्लेशियरों के पिघलने और जल चक्र में बढ़ती अनिश्चितता के कारण यह बढ़ते जलवायु जोखिमों का सामना कर रहा है। इसी कारण बड़े बांधों की अपेक्षा छोटी तथा रन-ऑफ-द-रिवर यानी नदी के प्राकृतिक प्रवाह पर आधारित परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जा रही है।
अन्य स्रोतों, जैसे बायोमास और पवन ऊर्जा, की भूमिका अभी सीमित है, जबकि पुगा घाटी जैसे संभावनाशील स्थलों के बावजूद भू-तापीय ऊर्जा का पर्याप्त उपयोग नहीं हो पाया है। दुर्गम भू-भाग, क्षमता-आधारित नीतियां, कमजोर संस्थागत समन्वय तथा दूरदराज के हिमालयी गांवों के लिए ऑफ-ग्रिड ढांचे का अभाव इसकी प्रमुख बाधाएं हैं।
शोध के आधार पर भू-भाग के अनुसार अनुकूलित सब्सिडी, प्रदर्शन-आधारित नीतिगत मापदंड, सिंगल-विंडो क्लीयरेंस, समर्पित हिमालयन ऑफ-ग्रिड रिन्यूएबल मिशन, जलवायु-सहनशील डिजाइन मानक तथा राज्य-विशिष्ट नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों जैसी व्यावहारिक नीतिगत सिफारिशें की गई हैं। इन उपायों को अपनाकर नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों के उपयोग को बढ़ाया जा सकता है।
शोध पत्र में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र स्वच्छ ऊर्जा के एक उभरते क्षेत्र से आगे बढ़कर स्वच्छ ऊर्जा का अग्रणी केंद्र बन सकता है, लेकिन यह तभी संभव होगा, जब लक्षित, क्षेत्र-संवेदनशील और जलवायु-जागरूक नीतिगत सुधार प्रभावी ढंग से लागू किए जाएं।

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