क्या होगा इस देश का, कोई न जाने हाल।
सबकी अपनी डफली, अपनी-अपनी ताल!
अलग-अलग ये झंडे हैं,
राजनीति के धंधे हैं।
हर नेता प्रधान यहां है,
‘तिरंगे’ का सम्मान कहां है।
रिश्वत, हेरा-फेरी करके,
कहते, ये तो चंदे हैं।
रोज नया घोटाला यहां है,
खरबों का ‘हवाला’ यहां है।
काला धन विदेश में धरते,
खलनायक मुश्टंडे हैं।
‘आदर्श’ को भी दाग लगाया,
शहीदों का भी हक उड़ाया।
(शहीदों के परिवार के लिए बनी “हाउसिंग सोसायटी”)
सेवा नहीं, ये ठगते जन को,
नायक नहीं, दरिंदे हैं।
जिंदाबाद-जिंदाबाद, जिनकी होती जिंदाबाद,
कुर्सी से जुड़े वे बंदे हैं।
कहने को ‘आजाद’ हैं हम,
हर चेहरे पर दिखता गम!
सियासत का बिगड़ा रूप देख,
बूढ़ी आजादी पशेमान है!
-त्रिलोचन सिंह अरोरा
