मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाकील पर टंगा संसार!

कील पर टंगा संसार!

दीवार पर एक फोटो फ्रेम टांग रही थी।
एक हाथ में छोटी-सी कील,
दूजे में भारी-सी हथौड़ी लिए थी।
जैसे ही एक चोट कील पर करनी चाही,
छिटककर कील दूर जा गिरी।
मैंने कील उठाने को हाथ बढ़ाया।
कील ने कुछ बुदबुदाया।
कील छोटी थी, पर विश्वास से भरी थी।
बड़े नम्र स्वर में बोली—
“जब भी तुमने मुझे कहीं गाड़ा है,
किसी को पीड़ा देने से पहले
मैंने अपने सिर पर वार सहा है।
पीड़ा पहुंचाती हूं तो
स्वयं पीड़ा सहती भी हूं।”
आगे बोली कील, “मैंने तुम्हारी गृहस्थी को ही नहीं,
विश्व को अपने ऊपर टांग रखा है।
झोंपड़ी से लेकर महलों तक,
खिलौनों से लेकर रोबोट तक,
लकड़ी के पटरे से लेकर
खाने की मेज और सोफे तक,
हर जगह मैं जुड़ी हुई हूं।
बस, कार, नाव, जलपोत, रेल और हवाई जहाज,
मीलों लंबी रेल पटरियों को जोड़े हुए हूं।
रसोईघर से लेकर तुम्हारे शयनकक्ष तक,
कमरे में लगी घड़ी और छत के हुक से लटका पंखा,
खिड़की का एसी, दीवार पर जड़ा टीवी—
सभी मेरी बदौलत टिके हुए हैं।
मेरा अस्तित्व यहां हर जगह दिख रहा है।
बैग, छतरियां और कपड़े मुझ पर ही टंगे हैं।
फ्रिज, अलमारी और शेल्फ मुझसे ही जुड़े हुए हैं।
आर्ट गैलरी और संग्रहालय, सभी में मेरी जरूरत है।
और तुमने मेरे रूप, रंग, आकार और नाम,
सबको बदलने की कसम खा रखी है।
कभी कील, हुक, पेच, बोल्ट कहा,
तो कभी स्क्रू, तो कभी खपच्ची भी बुलाया।
जो कहो, यह तुम्हारी इच्छा।
मैंने तो तुम्हें ही नहीं,
विश्व को टांग रखा है।”

-बेला विरदी

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