मुख्यपृष्ठसमाज-संस्कृतिपुस्तक समीक्षा: महासमर- “स्वराज्य सर्वोपरि” है

पुस्तक समीक्षा: महासमर- “स्वराज्य सर्वोपरि” है

-शिवाजी, संताजी, धनाजी, कान्होजी एवं बालाजी की महागाथा

राजेश विक्रांत 

इन्फोमीडिया व मनोरंजन की दुनिया की नामचीन हस्ती राघवेश अस्थाना का नया उपन्यास ‘महासमर: स्वराज्य सर्वोपरि’ की मुख्य कथा छत्रपति शिवाजी महाराज के शासनकाल से शुरू होकर अगली सदी तक जाती है। इसमें शिवाजी के समय के अन्य प्रेरक व्यक्तित्वों—संताजी घोरपड़े, धनाजी जाधव, कान्होजी आंग्रे तथा बालाजी विश्वनाथ की महागाथा दर्ज की गई है। साथ ही 17वीं सदी के जल और थल पर हुए उन भीषण युद्धों की दास्तां भी है, जिन्होंने भारत का इतिहास बदल दिया।
यह कथा है मध्ययुगीन भारत के महासमर की। 14वीं सदी से 18वीं सदी तक का भारत अत्यंत विषम परिस्थितियों से गुजरा। इस काल में 17वीं तथा 18वीं सदियां सबसे अहम रहीं। शिवाजी के काल में संताजी घोरपड़े, धनाजी जाधव, कान्होजी आंग्रे एवं बालाजी विश्वनाथ की महत्वपूर्ण भूमिका रही। संताजी के पिता म्हालोजी शिवाजी के वरिष्ठ सेनानायकों में से एक थे और संभाजी के शासनकाल में कुछ समय के लिए प्रमुख सेनापति भी रहे। किशोरावस्था में प्रमुख सेनापति हंबीरराव मोहिते का सानिध्य पाकर उनकी प्रतिभा ऐसी निखरी कि बड़े-बड़े युद्ध विशेषज्ञ भी आज तक उन्हें घुड़सवार सेना का अप्रतिम नायक मानते हैं।
धनाजी जाधव को अपनी बुआ तथा शिवाजी की माता जीजाबाई का संरक्षण और युवावस्था में प्रतापी मराठा सेनापति प्रतापराव गुर्जर का मार्गदर्शन मिला। वे कम उम्र में ही शिवाजी के अत्यंत प्रिय सरदार बन गए। जलसेना के नायक कान्होजी आंग्रे ने लगभग 40 वर्षों तक भारतीय समुद्री सीमाओं पर स्वदेशी मराठा परचम लहराया।
‘महासमर…’ की मुख्य कथा तो शिवाजी महाराज के शासनकाल से शुरू होकर अगली सदी तक जाती है, किंतु 17वीं सदी में हालात कैसे निर्मित हुए, यह जानने के लिए उपन्यास की शुरुआत 14वीं सदी से, यानी तैमूर और चंगेज के वंशजों के दौर से हुई है। इसके बाद पुस्तक के 62 उपशीर्षकों में मध्य भारत का सबसे बड़ा जौहर, सत्ता का संघर्ष, हुमायूँ की दिल्ली वापसी, दिल्ली का आखिरी हिन्दू सम्राट, अकबर का आगरा, एक राणा-एक मिर्जा, सलीम बना जहांगीर, खुर्रम की ताजपोशी, शाहजहाँ की संतति, हिन्दवी स्वराज्य, शिवाजी की आगरा यात्रा, कानिफनाथ का अंगारा, गुरुकुल, चक्रवात, तूफान, सत्ताईस वर्ष के युद्ध का आरंभ, सुवर्ण दुर्ग, आदिलशाही का पतन, कुतुबशाही का अंत, कनक दुर्ग का घेरा, मित्र सदा के लिए, चिपलूण का मुनीम, पलायन, धनाजी की शरण, ईस्ट इंडिया कंपनी का बॉम्बे, होली, एक साल का घेरा, एक चंद्रोदय और एक सूर्यास्त, प्रभानवल्ली का षड्यंत्र, रायगढ़ के आँसू, रामचंद्र पंत की युक्ति, दीदी, प्रतिशोध, चंद्री (जिंजी), भूख, चंद्री का घेरा, विचित्र द्वीप, दुर्भिसंधि, चौकी, जलदस्यु, दरार बनी खाई, गहिनाबाई, त्रिशूल का पहला फलक, त्रिकोण, चंद्री का पतन, राजाराम की वापसी, ध्वज वृंदाधिकारी, राजाराम का महाप्रयाण, शिवाजी द्वितीय की ताजपोशी, अंगरिया की अंगड़ाई, चौदह रुपए बारह आने की मजार, शाहूजी की वापसी, त्रिशूल का दूसरा फलक, कलम और तलवार, निजाम-उल-मुल्क, कैथरीन, परिवर्तन, बून की तैयारी, बून की पराजय, पेशवा तथा त्रिशूल का तीसरा फलक जैसे विषयों का समावेश है।
लेखक राघवेश अस्थाना इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, टीवी चैनल और मनोरंजन जगत की एक महत्वपूर्ण हस्ती हैं। ब्रांड कम्युनिकेशन और कंटेंट डेवलपमेंट के साथ प्रोग्रामिंग व निर्देशन में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने कई चैनलों के स्वरूप और शैली में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। साधना न्यूज़, यूटीवी रैदान मीडिया वर्क्स, स्टार विजय तथा जीएन इन्फो मीडिया में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र राघवेश अस्थाना इस समय महुआ टीवी में उच्च पद पर कार्यरत हैं। वे दक्षिण के प्रमुख निर्देशकों—के. बालाचंद्रन और टी. रामाराव—के प्रधान सहायक भी रह चुके हैं। इसलिए उनके लेखन की अपनी एक अलग शैली है। चाहे इतिहास हो या धर्म, अपनी विशिष्ट शैली के माध्यम से वे पाठकों पर गहरा प्रभाव छोड़ने में सफल होते हैं।
इससे पहले उनका उपन्यास ‘अमरत्व: किसी को श्राप! किसी को वरदान’ काफी चर्चित हुआ था। इस उपन्यास ‘महासमर…’ में भी उनकी लेखन शैली की स्पष्ट छाप मिलती है। वे ऐतिहासिक कहानियों और प्रसंगों को जीवंत शैली में प्रस्तुत करते हैं। इतिहास को औपन्यासिक स्वरूप देना कठिन होता है, लेकिन राघवेश अस्थाना इस विधा में ऐसी दक्षता के साथ लिखते हैं कि पाठक वाह-वाह कर उठता है। ‘महासमर…’ पढ़ते समय पाठकों को ऐसा महसूस होता है कि वे कोई उपन्यास नहीं, बल्कि किसी फिल्म, टीवी सीरियल या वेब सीरीज को साक्षात देख रहे हों।
पुस्तक का प्रकाशन इंडिया नेटबुक्स प्राइवेट लिमिटेड, नोएडा ने किया है। 258 पृष्ठों की इस कृति का मूल्य ₹550 है। यह पुस्तक न केवल ऐतिहासिक किस्सागोई के शौकीन पाठकों को, बल्कि आम पाठकों को भी पसंद आएगी, ऐसा मुझे पूरा भरोसा है।

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