पेपर लीक के खिलाफ न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे युवाओं की आवाज को दबाने के लिए भाजपा सरकार और दिल्ली पुलिस का दमनकारी ‘टूलकिट’ फिर से सक्रिय हो गया है। २० जुलाई के ‘संसद मार्च’ के दौरान हुई हिंसा का पूरा ठीकरा बेगुनाह छात्रों पर फोड़ते हुए दिल्ली पुलिस ने ११ एफआईआर दर्ज की हैं, जिनमें हजारों अज्ञात छात्रों को नामजद किया गया है।
तथ्य यह है कि हिंसा की शुरुआत छात्रों ने नहीं, बल्कि पुलिस और सादी वर्दी में आए असामाजिक तत्वों ने की थी। इसके स्पष्ट वीडियो प्रमाण मौजूद हैं, जिनमें पुलिसकर्मी खुद पथराव करते, गाड़ियां तोड़ते, छात्राओं को थप्पड़ मारते, कील लगी लाठियों और शॉक बैटन का इस्तेमाल करते दिख रहे हैं। इसके बावजूद बर्बरता करने वाले पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई के बजाय, अपने भविष्य की रक्षा मांग रहे छात्रों को निशाना बनाया जा रहा है।
सरकार की यह रणनीति नई नहीं है। सीएए-एनआरसी आंदोलन से लेकर मजदूर आंदोलनों तक, विरोध प्रदर्शनों में पुलिस द्वारा हिंसा भड़काना और बाद में झूठे मुकदमों, यूएपीए या एनएसए के तहत आंदोलनकारियों का दमन करना मोदी सरकार का पुराना ढर्रा रहा है।
छात्रों के खिलाफ दमन के हथकंडे
छावनी में तब्दील इलाके: जामिया, ओखला जैसे छात्र-बहुल क्षेत्रों में युवाओं को रोककर निजी जानकारी दर्ज की जा रही है, आईडी कार्ड और सोशल मीडिया हैंडल्स चेक किए जा रहे हैं।
तकनीक का दुरुपयोग: प्रदर्शन स्थलों पर फेशियल रिकॉग्निशन वैâमरों से डेटाबेस तैयार किया जा रहा है, ताकि आंदोलन खत्म होते ही छात्रों को घरों से उठाकर जेल भेजा जा सके।
परिजनों का उत्पीड़न: आंदोलन में मदद करने वाले कार्यकर्ताओं (जैसे यूपी के जुनैद भाई) के परिजनों को हिरासत में लेकर डराया-धमकाया जा रहा है।
२० जुलाई की हिंसा के नाम पर छात्रों पर दर्ज सभी फर्जी एफआईआर तुरंत रद्द की जाएं।
बर्बर लाठीचार्ज और हिंसा में शामिल दोषी पुलिसकर्मियों व सादे कपड़ों वाले गुंडों पर निष्पक्ष जांच कर सख्त कार्रवाई की जाए।
चुप रहे तो छीन लिया जाएगा अधिकार
यदि हम आज इस पुलिसिया तानाशाही और असंवैधानिक रवैये पर चुप रहे, तो आने वाले समय में हर नागरिक का विरोध करने का लोकतांत्रिक अधिकार छीन लिया जाएगा। आंदोलन के जीवित रहते ही इन मांगों को प्राथमिकता से उठाना होगा!
