उमन गुप्ता
मुंबई को देश की आर्थिक राजधानी कहा जाता है, लेकिन आज यह शहर केवल विकास परियोजनाओं के लिए नहीं, बल्कि बढ़ती लागत, आगे बढ़ती समय-सीमा और अधूरे निर्माण कार्यों के कारण भी चर्चा में है। मेट्रो, कोस्टल रोड, अटल सेतु से जुड़ने वाले कनेक्टर, नए फ्लाईओवर और पुल, इन सभी परियोजनाओं को मुंबई के भविष्य की रीढ़ बताया गया था, लेकिन कई परियोजनाएं तय समय पर पूरी नहीं हो सकीं, जिससे नागरिकों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि आखिर विकास की कीमत कौन चुका रहा है।
सबसे चर्चित परियोजनाओं में शिवड़ी–वर्ली एलिवेटेड कनेक्टर शामिल है। यह परियोजना मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक (अटल सेतु) को बांद्रा-वर्ली सी-लिंक और कोस्टल रोड से जोड़ने के लिए बनाई जा रही है। इसकी मूल अनुबंध लागत लगभग १,०५१.८६ करोड़ तय की गई थी। पहले इसे सितंबर २०२६ तक पूरा करने का लक्ष्य था, लेकिन अब इसके २०२७ की शुरुआत तक पूरा होने की संभावना जताई जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि रेलवे ब्लॉक मिलने में देरी, भूमिगत उपयोगिताओं को हटाने, मानसून और तकनीकी चुनौतियों के कारण काम प्रभावित हुआ, लेकिन आम मुंबईकर के लिए इसका मतलब है, लंबा ट्रैफिक जाम, अधिक यात्रा समय और रोजमर्रा की परेशानी।
लागत बढ़ने की तस्वीर और भी चिंताजनक है। बीएमसी के २०२६-२७ बजट के अनुसार, मुंबई की तीन प्रमुख फ्लाईओवर परियोजनाओं की कुल अनुमानित लागत ४,०१३ करोड़ से बढ़कर ६,६७५ करोड़ हो गई है। यानी लगभग २,६६२ करोड़ की वृद्धि, जो करीब ६६ प्रतिशत है। इनमें दो परियोजनाओं की लागत लगभग दोगुनी हो गई। प्रशासन का तर्क है कि डिजाइन में बदलाव, जीएसटी, निर्माण सामग्री की बढ़ती कीमत और तकनीकी संशोधनों के कारण लागत बढ़ी। लेकिन सवाल यह है कि यदि शुरुआती योजना और अनुमान इतने सटीक होते, तो क्या जनता पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ता?
इसी तरह मुंबई मेट्रो लाइन-३ (एक्वा लाइन) भी समय और लागत बढ़ने का बड़ा उदाहरण है। इस परियोजना की प्रारंभिक लागत लगभग २३,१३६ करोड़ थी, जो बढ़कर ३७,२७६ करोड़ तक पहुंच गई। यानी करीब १४,००० करोड़ की अतिरिक्त लागत। समय-सीमा भी कई बार आगे बढ़ी। हालांकि, अब इसके चरणबद्ध संचालन से यात्रियों को राहत मिलने लगी है, लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि इतनी बड़ी देरी और लागत वृद्धि की जवाबदेही किसकी है।
कब तय होगी जवाबदेही
सबसे बड़ा मुद्दा जवाबदेही का है। जब कोई परियोजना वर्षों तक लटकती है और उसकी लागत हजारों करोड़ रुपए बढ़ जाती है, तो केवल तकनीकी कारण बताना पर्याप्त नहीं है। नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि देरी के लिए कौन जिम्मेदार है, अतिरिक्त खर्च क्यों हुआ और भविष्य में ऐसी स्थिति रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे। सवाल यह नहीं है कि मुंबई में विकास होना चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि विकास समय पर, तय लागत में और पूरी पारदर्शिता के साथ क्यों नहीं हो पाता। जब तक परियोजनाओं की प्रगति और खर्च पर स्पष्ट जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक हर नई घोषणा के साथ जनता के मन में यही प्रश्न उठता रहेगा, क्या ये परियोजनाएं भी अधूरे वादों की सूची में शामिल हो जाएंगीr?
