गलियारे हो गये सूने
अपने कदमों की आवाज देंगी सुनाई
बड़ी हवेलियां नही रखती
निकली चित्कारो को समेट
खंडहरों में सूनापन
अपने डैने फैलाता चहुं ओर
घर्षण अपनी ही सांसों का
सुनाई पड़ जाता हर ओर
सूनापन मिलता अपनों की भीड़ में
खामोशी से आशाएं टूटती
दूसरा कोई महसूस नहीं करता
सन्नाटा पसरा होता मरघट पर
कितना भी पुकारो
कोई नहीं देगा प्रतिउत्तर
खामोशी तोड़ेंगी अपनी कराहटे
ले लेंगे कुछ गहरी सांसें
हवा का झोंका जलती चिताओं से
चिंगारियां को ऊपर उड़ा देगा
किसी बुझी चिता की
थोड़ी राख बिखेर देगा
सबकुछ बिना आवाज के घट जाता
सरसराहट है गिरे सूखे पत्तों की
उदासी है अकेले पन की
सीलन है भीगी आंखों की
महक है अर्थी से गिरे फूलों की
चेहरों पर पसरी लाचारी की
मासूमियत नहीं, डर है मृत्यु का
प्रयत्न है उसे कुछ समय ढकेलने का
मौत ही उत्तर हो सकती
जो पसरे सन्नाटे को भेद सकती।
-बेला विरदी
