अनिल मिश्र / रांची
कुछ लोग सत्ता से इतिहास बनाते हैं, लेकिन कुछ लोग संघर्ष से इतिहास लिखते हैं। दिशोम गुरु शिबू सोरेन उन्हीं विरले जननायकों में थे, जिन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण जल, जंगल, जमीन, आदिवासी अस्मिता और झारखंड की पहचान के लिए समर्पित कर दिया।”4 अगस्त 2026 को दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि है। यह केवल एक राजनीतिक नेता को श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक संघर्ष को स्मरण करने का दिन है जिसने भारत के संघीय ढांचे को नया आयाम दिया। झारखंड राज्य का निर्माण किसी सरकार की कृपा नहीं था, बल्कि दशकों के जनांदोलन, हजारों आंदोलनकारियों के त्याग और शिबू सोरेन जैसे नेताओं के अदम्य साहस का परिणाम था।
शिबू सोरेन का जन्म ऐसे समाज में हुआ, जहाँ आदिवासी और मूलवासी समुदाय महाजनी शोषण, भूमि हड़पने की साजिशों, विस्थापन और आर्थिक असमानता से जूझ रहे थे। उनके पिता सोबरन सोरेन स्वयं सामाजिक अन्याय के विरुद्ध संघर्षरत थे। उनके निधन ने युवा शिबू सोरेन के भीतर अन्याय के खिलाफ लड़ने का संकल्प और मजबूत किया। उन्होंने सत्ता पाने के लिए राजनीति नहीं की, बल्कि समाज को न्याय दिलाने के लिए राजनीति को संघर्ष का माध्यम बनाया।उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने आदिवासी समाज की पीड़ा को जंगलों और गांवों से निकालकर संसद और राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचाया। उस दौर में जब आदिवासी प्रश्न राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में नहीं थे, शिबू सोरेन ने जल, जंगल, जमीन, स्थानीय पहचान और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समुदायों के अधिकार को लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा बनाया।उन्होंने महाजनी प्रथा, बंधुआ शोषण और जमीन की लूट के खिलाफ व्यापक जनआंदोलन खड़ा किया। उनके आंदोलन ने केवल आर्थिक न्याय की मांग नहीं की, बल्कि सम्मानजनक जीवन, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक अधिकारों की लड़ाई को भी नई दिशा दी। यही कारण है कि उन्हें केवल झारखंड का नेता नहीं, बल्कि “दिशोम गुरु” अर्थात जनता का मार्गदर्शक कहा गया।
झारखंड आंदोलन का इतिहास अनेक महान नेताओं के योगदान से बना है। बिरसा मुंडा ने अंग्रेजी शासन और अन्याय के विरुद्ध जनविद्रोह का बिगुल फूंका। जयपाल सिंह मुंडा ने संविधान सभा में आदिवासियों की आवाज बुलंद की। विनोद बिहारी महतो, ए.के. राय और निर्मल महतो ने अलग राज्य की राजनीतिक चेतना को मजबूत किया। लेकिन इस आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाने, उसे निरंतर जीवित रखने और राजनीतिक परिणाम तक पहुँचाने में शिबू सोरेन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।यह उक्त बातें झारखंड प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता विजय शंकर नायक ने कही। उन्होंने ने इसी बीच कहा कि उनका संघर्ष केवल अलग राज्य तक सीमित नहीं था। वे हमेशा इस बात पर जोर देते रहे कि झारखंड बनने का उद्देश्य केवल नई राजधानी बनाना नहीं, बल्कि आदिवासी, मूलवासी, किसान, मजदूर और गरीब परिवारों को सम्मानजनक जीवन देना है। उनकी राजनीति का केंद्र सत्ता नहीं, समाज था।संसद में हो या सड़क पर, शिबू सोरेन ने हमेशा झारखंड की आवाज को प्राथमिकता दी। वे कई बार सांसद बने, केंद्र सरकार में मंत्री रहे और झारखंड के मुख्यमंत्री भी बने। उनके राजनीतिक जीवन में उतार-चढ़ाव भी आए, विवाद भी हुए और कठिन परिस्थितियाँ भी आईं। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि उन्होंने हर बार जनता के बीच लौटकर अपनी राजनीतिक ताकत हासिल की। यही किसी जननेता की सबसे बड़ी पहचान होती है।झारखंड बनने के बाद भी उन्होंने बार-बार यह कहा कि राज्य का वास्तविक विकास तभी होगा जब प्राकृतिक संसाधनों का लाभ सबसे पहले स्थानीय लोगों को मिलेगा। वे विस्थापन, बेरोजगारी, आदिवासी अधिकारों, शिक्षा और स्थानीय नीति जैसे मुद्दों पर लगातार आवाज उठाते रहे। आज भी झारखंड की राजनीति में उनकी वैचारिक छाप स्पष्ट दिखाई देती है।
दिशोम गुरु की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने आदिवासी समाज को केवल वोट बैंक नहीं माना। उन्होंने उसे राजनीतिक सम्मान दिलाने का प्रयास किया। उनकी राजनीति में भाषा, संस्कृति, परंपरा और सामाजिक पहचान को बराबर महत्व मिला। उन्होंने यह स्थापित किया कि विकास और आदिवासी अस्मिता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं।आज जब उनकी पहली पुण्यतिथि मनाई जा रही है, तब यह प्रश्न पूरे देश के सामने खड़ा है कि क्या ऐसे जननायक को अभी तक भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान “भारत रत्न” नहीं मिलना चाहिए था?भारत रत्न केवल व्यक्तिगत सम्मान नहीं है। यह उस विचार, उस संघर्ष और उस ऐतिहासिक योगदान का सम्मान होता है जिसने भारत के लोकतंत्र को मजबूत किया हो। यदि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सामाजिक न्याय की लड़ाई को राष्ट्रीय पहचान दी, यदि सरदार पटेल ने राष्ट्रीय एकीकरण का कार्य किया, यदि अटल बिहारी वाजपेयी को उनके राष्ट्रीय योगदान के लिए भारत रत्न मिला, तो झारखंड आंदोलन को लोकतांत्रिक सफलता तक पहुँचाने वाले दिशोम गुरु शिबू सोरेन के योगदान पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।
दुर्भाग्यपूर्ण है कि उनकी पहली पुण्यतिथि तक केंद्र सरकार ने उन्हें भारत रत्न देने की दिशा में कोई पहल नहीं की। यह विषय राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर देखने का है। किसी भी लोकतंत्र की परिपक्वता इस बात से तय होती है कि वह अपने उन नेताओं का सम्मान कैसे करता है जिन्होंने वंचित समाजों को आवाज दी।झारखंड केवल खनिज संपदा का राज्य नहीं है, बल्कि संघर्षों की धरती भी है। यदि इस संघर्ष की सबसे बड़ी राजनीतिक पहचान शिबू सोरेन रहे हैं, तो उनका सम्मान केवल झारखंड का नहीं, बल्कि पूरे भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का सम्मान होगा।
आज आवश्यकता है कि झारखंड विधानसभा सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत भारत रत्न देने की अनुशंसा करे। संसद के सभी दलों के सांसदों को भी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस मांग का समर्थन करना चाहिए। यह किसी एक दल का नहीं, बल्कि झारखंड की साढ़े तीन करोड़ जनता के सम्मान का प्रश्न है।उनकी पहली पुण्यतिथि पर केंद्र सरकार को यह संदेश देना चाहिए कि भारत उन नेताओं को कभी नहीं भूलता जिन्होंने लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय अस्मिता को मजबूत किया। भारत रत्न केवल दिल्ली की राजनीति करने वालों का अधिकार नहीं है; यह उन जननायकों का भी अधिकार है जिन्होंने जंगलों, पहाड़ों और गांवों से उठकर भारत के लोकतंत्र को नई दिशा दी।दिशोम गुरु शिबू सोरेन का जीवन आने वाली पीढ़ियों को यह प्रेरणा देता रहेगा कि संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता। सत्ता बदलती है, सरकारें बदलती हैं, लेकिन जनआंदोलनों की विरासत अमर रहती है। झारखंड की पहचान, आदिवासी स्वाभिमान और सामाजिक न्याय की लड़ाई का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, उसमें दिशोम गुरु शिबू सोरेन का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा।
उनकी पहली पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि। यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि उनके सपनों का झारखंड और न्यायपूर्ण भारत बनाने की दिशा में हम सभी ईमानदारी से आगे बढ़ें तथा उनके राष्ट्रीय योगदान को सम्मान देते हुए केंद्र सरकार उन्हें मरणोपरांत “भारत रत्न” प्रदान करने पर गंभीरतापूर्वक विचार करें।
