मुख्यपृष्ठस्तंभगपशप : दानपेटी या लूट की पेटी?.. भगवान के दरबार में भी...

गपशप : दानपेटी या लूट की पेटी?.. भगवान के दरबार में भी हाथ साफ!.. राम को नहीं छोड़ा… अब गणराया भी नहीं बचे!!

राजन पारकर

देश में चोरों का आत्मविश्वास अब इतना बढ़ गया है कि उन्हें बैंक लूटने, सरकारी खजाने में सेंध लगाने या ठेकों में कमीशन खाने से भी तसल्ली नहीं मिल रही। अब उनकी निगाह सीधे भगवान की दानपेटी पर है। शायद उन्हें भी मालूम है-भगवान अदालत में गवाही देने नहीं आते और भक्त श्रद्धा में सवाल पूछने से हिचकते हैं!
मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर को लेकर जो आरोप सामने आए हैं, यदि वे सही साबित होते हैं तो यह केवल पैसों की चोरी नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास की जेब काटने जैसा अपराध होगा। भक्त अपनी मेहनत की कमाई भगवान के चरणों में रखता है, लेकिन अगर वही रुपया भगवान तक पहुंचने से पहले किसी जेब में उतर जाए, तो उसे दानपेटी कहें या ‘लूट की पेटी’?
राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि कथित रूप से एक कर्मचारी के पकड़े जाने के बाद मंदिर की साप्ताहिक आय में अचानक कई गुना बढ़ोतरी दिखाई दी। अगर ऐसा है, तो सवाल उठना लाजिमी है। ‘जहां प्रसाद से पहले हिसाब बदल जाए, वहां चमत्कार नहीं, चरित्र की जांच जरूरी होती है।’ सवाल सिर्फ एक कर्मचारी का नहीं है। यदि व्यवस्था में सेंध लगी है तो वह अकेले हथौड़े से नहीं, कई हाथों से लगी होगी। बड़े आर्थिक खेल कभी अकेले नहीं खेले जाते। इसलिए जांच भी किसी एक चेहरे पर खत्म नहीं होनी चाहिए।
सूत्रों के अनुसार, चर्चा यह भी है कि जिस एजेंसी के कर्मचारी पर कथित आरोप लगा, उसका ठेका क्यों जारी रहा? क्या जिम्मेदारी सिर्फ चौकीदार की है या फिर कुछ ऐसे हाथ भी हैं जो दिखाई नहीं देते, लेकिन हर गिनती में शामिल रहते हैं? आजकल धर्म के नाम पर भाषण देने वालों की कतार लंबी है। लेकिन धर्म के धन की रक्षा करने वाले कितने हैं? मंदिर की घंटियां तो रोज गूंजती हैं, मगर जवाबदेही की घंटी शायद ही कभी सुनाई देती है। श्रद्धा का मतलब आंखें बंद करना नहीं होता। श्रद्धा का अर्थ है-विश्वास। और जब विश्वास ही चोरी हो जाए तो सोने का कलश भी मन का बोझ हल्का नहीं कर सकता। सरकार, मंदिर ट्रस्ट और जांच एजेंसियों को बिना किसी राजनीतिक दबाव के पूरी पारदर्शिता से जांच करनी चाहिए। यदि आरोप निराधार हैं तो सच्चाई सामने आए और यदि आरोप सही हैं तो दोषियों पर ऐसी कार्रवाई हो कि भविष्य में कोई भगवान के घर को भी आसान निशाना समझने की हिम्मत न करे। क्योंकि भगवान के दरबार से पैसा चुराने वाला सिर्फ धन का अपराधी नहीं होता- वह करोड़ों लोगों की आस्था का भी डाकू होता है। आज हर श्रद्धालु सिर्फ एक सवाल पूछ रहा है- ‘भगवान के नाम पर डाला गया मेरा रुपया, भगवान तक पहुंचता है… या बीच रास्ते में किसी की जेब में दर्शन कर लेता है?’ यही सवाल आज सिर्फ सिद्धिविनायक का नहीं, पूरे देश की आस्था का है।

अन्य समाचार