संतोषी रावत
जंतर-मंतर पर नीट परीक्षा में हुई गड़बड़ी के खिलाफ सफल अनशन आंदोलनों के बाद अब ई-२० पेट्रोल (२० प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित र्इंधन) को लेकर बहस तेज हो गई है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) के अभिजीत दीपके द्वारा इथेनॉल के मुद्दे को बैठक में उठाने की बात इस बात का संकेत है कि नीतियां जितनी महत्वपूर्ण हैं, जनहित में उनके प्रभावों पर चर्चा उतनी ही जरूरी है। अभिजीत ने साफ कर दिया है कि सीजेपी किसी पॉलिटिकल पार्टी की तरह एक नंबर बनकर नहीं रहना चाहती।
बकौल अभिजीत सोशल मीडिया पर लोग नया राजनीतिक विकल्प देने की मांग कर रहे हैं, लेकिन उन्हें ऐसा लगता है कि इस समय देश को किसी नई पार्टी से ज्यादा एक मजबूत जन आंदोलन की जरूरत है, जो बढ़ती बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर भी विस्तार से चर्चा करे। मुद्दों की कमी नहीं है। जरूरत है उसे खुलकर सामने लाने की। राजनीतिक दलों की अपनी एक प्रतिबद्धता होती है, उनके लिमिटेशन होते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है, क्या भारत में एक मजबूत और निष्पक्ष ‘प्रेशर ग्रुप’ (दबाव समूह) की जरूरत है?
इसका सीधा जवाब है, हां, बिल्कुल।
दबाव समूहों की भूमिका महत्वपूर्ण
एक सशक्त लोकतंत्र केवल हर पांच साल में वोट देने तक सीमित नहीं होता। नीति निर्माण और उसके व्यावहारिक क्रियान्वयन के बीच का संतुलन बनाए रखने के लिए दबाव समूहों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। भारत में प्रेशर ग्रुप्स की तत्काल आवश्यकता क्यों है, इसे निम्नलिखित बिंदुओं से समझने की कोशिश करते हैं।
जनता की आवाज को मंच देना
सरकारें जब कोई बड़ा नीतिगत पैâसला (जैसे ई२० पेट्रोल या कर नीतियां) लेती हैं, तो अक्सर उनका ध्यान बड़े आर्थिक आंकड़ों पर होता है। एक प्रेशर ग्रुप आम नागरिक की रोजमर्रा की समस्याओं (जैसे इंजन खराब होना, माइलेज कम होना) को सरकार के सामने मजबूती से रखता है।
उत्तरदायित्व और पारदर्शिता
राजनीतिक दल चुनाव जीतने और सत्ता में बने रहने के समीकरणों में उलझे रहते हैं। एक गैर-राजनीतिक दबाव समूह बिना किसी चुनावी एजेंडे के सरकारों को उनके वादों और निर्णयों के प्रति जवाबदेह बनाता है।
विशेषज्ञता आधारित पैरवी
नीतियां जटिल होती हैं। आम जनता तकनीकी बारीकियों को नहीं समझ पाती। प्रेशर ग्रुप्स में शामिल विशेषज्ञ आंकड़ों और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर जनता और सरकार के बीच एक सेतु का काम करते हैं।
लोकतंत्र का ‘सुरक्षा कवच’
सत्ता और कॉर्पोरेट हितों के बीच जब आम उपभोक्ता पिसने लगता है, तब एक स्वतंत्र प्रेशर ग्रुप ही लोकतंत्र के ‘सुरक्षा कवच’ के रूप में कार्य करता है। ई२० पेट्रोल पर शुरू हुआ यह घमासान केवल र्इंधन का मुद्दा नहीं है; यह इस बात का प्रमाण है कि देश को एक ऐसे संगठित मंच की सख्त जरूरत है, जो बिना किसी राजनीतिक द्वेष के केवल ‘जनहित’ को सर्वोपरि रखकर सरकार की नीतियों को चुनौती दे सके और सही दिशा में मोड़ सके।
