हिमांशु राज
मध्य प्रदेश के दतिया उपचुनाव के परिणामों ने उत्तर प्रदेश की सियासी संभावनाओं में तेज हलचल पैदा कर दी है। भाजपा की हार जहां सत्ता पक्ष के लिए चेतावनी है, वहीं नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) का प्रदर्शन साफ संदेश देता है कि दलित और बहुजन वोटबैंक पर अब नया केंद्र उभर सकता है। दामोदर यादव ने २२ हजार से अधिक वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहते भी १४ प्रतिशत से अधिक वोट शेयर हासिल किया- यह केवल मतों का आंकड़ा नहीं, बल्कि सामाजिक स्वीकार्यता और राजनीतिक संभाव्यता का संकेत है।
यूपी में बहुजन समाज पार्टी की लगातार गिरती पहुंच ने दलित राजनीति में एक बड़ा रिक्त स्थान छोड़ा था। उस रिक्त स्थान को भरने की क्षमता आजाद समाज पार्टी में दिख रही है। चंद्रशेखर ने २०२७ के लिए ४५ संभावित उम्मीदवारों की सूची जारी कर पहले ही राजनीतिक मैसेज दे दिया- १८ दलित, १७ ओबीसी और ९ मुस्लिम चेहरे- जातीय समावेशन की स्पष्ट दिशा। पर सूची में एक भी सामान्य वर्ग का उम्मीदवार न होना भी दर्शाता है कि उनका फोकस विशेष सामाजिक समूहों पर ही केंद्रित है; बड़े चुनावी समीकरण में यह रणनीति कितना व्यापक सहमति जुटा पाएगी, यह बड़ा सवाल है।
चंद्रशेखर की ताकत उनके युवा चेहरे, आक्रामक रुख और सक्रिय सड़कों-आंदोलनों में दिखी है। जंतर-मंतर के ‘जेन-जी’ आंदोलन में उनकी मौजूदगी ने उन्हें शहरी युवा वोटरों के बीच पहचान दी। पर राजनैतिक सफलता के लिए केवल दिखावों से काम नहीं चलेगा। गहरी संगठनात्मक रचना, स्थानीय नेताओं का भरोसा, प्रत्याशियों की स्वीकार्यता और बहुध्रुवीय गठबंधन बनाना जरूरी होगा। बस शेयर बढ़ना ही जीत की गारंटी नहीं बनता; उसे वोटों में तब्दील करने का जमीनी तंत्र मजबूत होना चाहिए।
दतिया का प्रदर्शन संकेतक है, निर्णायक परिणाम नहीं। यदि आजाद समाज पार्टी इस संवेग को व्यवस्थित संगठन, चुनावी रणनीति और व्यापक सामाजिक गठजोड़ में बदल दे, तो २०२७ में यूपी की राजनीति में उसकी भूमिका निर्णायक हो सकती है। वरना यह सिर्फ एक अस्थायी उभार साबित होगा। चंद्रशेखर के सामने अब चुनौती है: भावनात्मक अपील को संस्थागत ताकत में बदलना- तभी वह दलित राजनीति का नई धुरी बन सकेंगे।
