भारत में शिक्षा का क्षेत्र किस तरह बर्बाद हो चुका है या बर्बाद किया गया है, इसकी एक दुखद तस्वीर `जंतर-मंतर’ पर हुए आंदोलन की बदौलत दुनिया के कोने-कोने तक पहुंच गई। इस आंदोलन की वजह से देश की शिक्षा व्यवस्था की धज्जियां दुनिया के चौराहे पर उड़ गर्इं। शिक्षा क्षेत्र का व्यापार बनाने वाले पेपर लीक के मामलों से मोदी सरकार की थू-थू हुई ही थी कि अब नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट की वजह से भी मोदी सरकार पर अपना मुंह छिपाने की नौबत आ गई है। नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में देश की स्कूली शिक्षा की जो हकीकत पेश की है, वह बेहद खौफनाक है। देश में स्कूलों की संख्या दिन-ब-दिन घट रही है और स्कूल में दाखिला लेने वाले अनगिनत छात्रों को बीच में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ रही है। सरकार के पास मौजूद आंकड़ों के मुताबिक, देश में हर दस में से करीब चार छात्र बारहवीं कक्षा तक पहुंच ही नहीं पाते। यानी बारहवीं से पहले ही इन छात्रों की पढ़ाई छूट जाती है। दस में से चार यानी छात्रों के ड्रॉप-आउट की यह दर पूरे ४० फीसदी है। वैश्विक स्तर पर `विश्वगुरु’ बनने का ढिंढोरा पीटने वाले देश के नेतृत्व के लिए क्या यह शर्मनाक नहीं है? नीति आयोग की यह रिपोर्ट बताती है कि देश में स्कूली शिक्षा की हालत कितनी गंभीर है। देश में एक लाख से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं, जो `एक-शिक्षकीय’ हैं। यानी एक ही शिक्षक को पूरा प्राथमिक स्कूल चलाना पड़ता है। पहली से चौथी कक्षा तक के छात्रों को तमाम विषय पढ़ाने के लिए सिर्फ एक ही शिक्षक! शिक्षा का इससे ज्यादा क्रूर मजाक और क्या हो सकता है? यह तो हुई शिक्षकों की बात; इसके अलावा छात्रों की संख्या का हाल भी बेहद अजीब है! देश में ७,९९३ स्कूल ऐसे हैं, जिनमें एक भी छात्र नहीं है। यानी छात्रों के बिना
सिर्फ शिक्षकों वाले
स्कूलों की संख्या आठ हजार के करीब है। पिछले आठ-नौ सालों में देश के पूरे ९२ हजार स्कूल बंद हो गए। कम छात्र संख्या के कारण स्कूलों का विलय (मर्जर) या पुनर्गठन भले ही एक वजह हो, लेकिन बढ़ती आबादी की तुलना में देश में स्कूलों की संख्या बढ़ने के बजाय एक लाख से कम हो जाना यकीनन कोई अच्छा संकेत नहीं है। आज के समय में देश के १४.७१ लाख स्कूलों में २४.६९ करोड़ छात्र भले ही पढ़ रहे हों, लेकिन स्कूलों में दाखिला लेने वाले इन छात्रों को बारहवीं कक्षा तक रोके रखने में देश की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। प्राथमिक स्कूल में दाखिला की दर जहां ९०.९ फीसदी है, वहीं उच्च माध्यमिक स्तर यानी बारहवीं तक पहुंचते-पहुंचते छात्रों का यह अनुपात गिरकर महज ५८.४ फीसदी रह जाता है। यानी प्राथमिक शिक्षा के लिए दाखिला लेने वाले ४० फीसदी छात्र बारहवीं से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। वजहें चाहे जो भी हों, पर नीति आयोग की यह रिपोर्ट यही बताती है कि इन छात्रों को उच्च माध्यमिक शिक्षा तक टिकाए रखने में सरकार नाकाम रही है। देश में गरीबी और शिक्षा पर लगातार बढ़ता खर्च इसकी मुख्य वजह है। प्राथमिक शिक्षा की तुलना में उच्च माध्यमिक शिक्षा का खर्च तीन से पांच गुना ज्यादा है। इसके अलावा बढ़ती हुई शैक्षणिक फीस, परीक्षा फीस और सफर व अन्य खर्चों का बोझ जब अभिभावक सहन नहीं कर पाते, तो बच्चों की पढ़ाई बीच में ही रुक जाती है। यह हकीकत साफ सामने होने के बावजूद, सरकार का शिक्षा विभाग छात्रों के इस ड्रॉप-आउट को रोकने के लिए कुछ भी करता दिखाई नहीं दे रहा है। सत्ता में आने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने जिस
`गुजरात मॉडल’ का ढिंढोरा
पीटा था, उस गुजरात की शैक्षणिक स्थिति तो बेहद दयनीय है। गुजरात के ५३,४२५ स्कूलों में १.१५ करोड़ छात्रों का पंजीकरण तो है, लेकिन उनमें से केवल ५४.५ फीसदी बच्चे ही बारहवीं तक की पढ़ाई पूरी कर पाते हैं। इसका मतलब यह है कि गुजरात के ४५.५ फीसदी छात्रों को बारहवीं से पहले ही पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। पूरे देश में माध्यमिक स्तर पर छात्रों के ड्रॉप-आउट की दर जहां सात फीसदी है, वहीं अकेले गुजरात में यह दर देश में सबसे ज्यादा यानी १२.५ फीसदी है। गुजरात में हर स्कूल में औसतन सात शिक्षक हैं और हर २९ छात्रों पर एक शिक्षक का अनुपात है, फिर भी गुजरात में छात्रों का ड्रॉप-आउट अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा है। कथित `गुजरात मॉडल’ कितना खोखला है, इसका इससे बड़ा सुबूत और क्या चाहिए? शिक्षा व्यवस्था, पेपर लीक का बाजार और रोजगार जैसे मुद्दों पर युवा `जेन-जी’ जब सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर रही है, ठीक उसी समय सरकार के नीति आयोग द्वारा जारी यह रिपोर्ट देश की स्कूली शिक्षा और पूरी शिक्षा व्यवस्था का नकाब उतारने वाली है, जो बेहद चौंकाने वाली है। एक तरफ देश की आबादी बढ़ रही है और दूसरी तरफ स्कूल धड़ाधड़ बंद हो रहे हैं। देश भर में लगभग एक लाख स्कूल बंद हो गए और छात्रों के ड्रॉप-आउट की दर भी ४० फीसदी तक पहुंच गई। प्राथमिक स्कूल में आने वाले दस में से चार छात्र बारहवीं तक पहुंच ही नहीं पाते, यह आंकड़े बेहद शर्मनाक हैं। स्वघोषित `विश्वगुरु’ के देश की पाठशालाओं की ये हालत है! अगर देश के छात्रों की यही दुर्दशा होनी है, तो शिक्षा के अधिकार के कानून को क्या भाड़ में झोंक देना चाहिए?
