मुख्यपृष्ठस्तंभविजय-विमर्श : जेन-जी के साथ मोदी और संघ का ‘डबल गेम’?

विजय-विमर्श : जेन-जी के साथ मोदी और संघ का ‘डबल गेम’?

 विजयशंकर चतुर्वेदी

‘आप तब कहां थे, जब ये बच्चे एके ४७, कीलों वाली लाठियां, इलेक्ट्रिक बैरिकेड्स, आंसू गैस, बेदम पिटाई और गिरफ्तारियां झेल रहे थे?’-शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) नेता आदित्य ठाकरे का यह सवाल आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत के प्रस्तावित जेन-जी संवाद से पहले आया है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि वे युवाओं से संवाद क्यों करना चाहते हैं, सवाल यह है कि अभी ही क्यों?
जेन-जी के साथ आरएसएस का डबल गेम
एक तरफ देश के कोने-कोने में अपने भविष्य की लड़ाई लड़ रहे छात्र हैं। दूसरी तरफ आरएसएस के सह-सरकार्यवाह अतुल लिमये उन्हें ‘राष्ट्र-विरोधी’ और ‘संविधान-विरोधी’ आंदोलन का हिस्सा बताते हैं। बीच में मोदी सरकार का अंध समर्थक-तंत्र है, जो आंदोलन में शामिल छात्रों को चुन-चुनकर सबक सिखाना चाहता है। फिर अचानक संघ प्रमुख जेन-जी से संवाद करने निकल रहे हैं। यहीं से एक बड़ा राजनीतिक सवाल पैदा होता है कि क्या जेन-जी के साथ डबल गेम खेला जा रहा है?
एक जेन-जी वह है, जिसने जवाबदेही, प्रश्नपत्र लीक, बेरोजगारी और देश के भविष्य को लेकर आवाज उठाई। दूसरी जेन-जी कुछ इस समझ के साथ तैयार की जा रही है कि न्यायप्रिय मोदी सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरे छात्रों को मंहतोड़ जवाब देना ही राष्ट्रसेवा है! स्पष्ट तौर पर यह कोई वैचारिक अभियान नहीं, युवाओं को युवाओं के ही सामने खड़ा कर देने की सोची-समझी राजनीति है।
मोदी की ‘माफी’ छलावा है या आश्वासन?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में एक वीडियो संदेश जारी किया था कि जिन्होंने उनको गालियां दीं, उन्हें माफ कर दिया गया है। लेकिन क्या सचमुच यही बात है? फिर आंदोलन से जुड़े छात्रों के प्रति कठोर कार्रवाई की शिकायतें क्यों सामने आ रही हैं? क्यों उनकी निजी जानकारी जुटाने या उनका करियर बरबाद कर देने जैसी धमकियां सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन रही हैं? भयभीत बच्चों के माफी मांगते वीडियो क्यों अचानक सामने आने लगे हैं? यदि जमीन पर तस्वीर इतनी अलग है, तो मोदी की माफी
‘मुख में राम बगल में छुरी’ से अधिक कुछ नहीं
यह मोदी और संघ की अविश्वसनीय राजनीतिक शैली का सवाल भी है। हम पिछले एक दशक से देख रहे हैं कि मोदी सार्वजनिक मंच पर जो बोलते हैं, संगठनात्मक स्तर पर उसका संदेश कुछ और ही होता है। यही कारण है कि मोहन भागवत के जेन-जी संवाद को भी संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या वे उन छात्रों से भी संवाद करेंगे, जिन्होंने प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ सड़क पर उतरकर लाठियां खार्इं? क्या वे उन युवाओं से भी मिलेंगे, जिन्हें उनके ही संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी ‘राष्ट्र-विरोधी’ और ‘संविधान-विरोधी’ बता चुके हैं? या वे युवाओं को यह समझाने जा रहे हैं कि असली समस्या केंद्र सरकार की नीतियां नहीं, बल्कि सरकार से सवाल पूछने वाले छात्र ही सारे बवाल की जड़ हैं?
देश को किस तरह की जेन-जी चाहिए?
एक तीर से कई निशाने साधने के तहत वर्तमान छात्र आंदोलन को वैचारिक रूप से कटघरे में खड़ा करने की मुहिम दिखाई देती है। अपने ही बच्चों के भविष्य की चिंता करने और उनकी बातें सुनने के बजाए, उनके तार देश विरोधी शक्तियों से जोड़े जाते हैं। उनके छात्र होने पर ही प्रश्न उठा दिए जाते हैं! उन्हें परजीवी कह दिया जाता है!!
एक तरफ प्रश्नपत्र लीक के विरोध में उतरे छात्रों के साथ पुलिसिया दमन की तस्वीरें सामने आती हैं, तो दूसरी तरफ कांवड़ यात्रा के दौरान हिंसा, हुड़दंग, तोड़-फोड़ और कानून अपने हाथ में लेने वाले युवाओं के प्रति प्रशासन और सत्तारूढ़ राजनीति का रवैया बिल्कुल अलग दिखाई देता है। यही विरोधाभास आरएसएस जनित बीजेपी सरकारों की नीयत पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
आखिर देश किस तरह की जेन-जी चाहता है? वह, जो सत्ता से सवाल पूछे या वह, जो सवाल पूछने वालों को ही राष्ट्र-विरोधी मानकर उनके सामने खड़ी कर दी जाए? यदि एक ही पीढ़ी के दो हिस्सों को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी बना दिया गया, तो सबसे बड़ी हार किसी राजनीतिक दल की नहीं होगी। हार उस पीढ़ी की होगी, जिसे भारत का भविष्य कहा जाता है।
मोदी सरकार की प्राथमिकता इन युवाओं को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा होने से बचाने की होनी चाहिए। यही कसौटी तय करेगी कि जेन-जी से सचमुच संवाद हो रहा है या उसके भीतर एक नया राजनीतिक विभाजन गढ़ा जा रहा है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, कवि-लेखक हैं और राष्ट्रीय नीति तथा भू-राजनैतिक विषयों पर नियमित लेखन करते हैं।)

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