-`चुनाव आयोग और विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय गलत’
– ‘महाशक्ति हमारे पीछे है’, यह दावा ही पार्टी-विरोधी गतिविधि का प्रमाण
-३१ विधायकों का पहले सूरत और फिर गुवाहाटी जाना पूर्वनियोजित साजिश
– विधायकों को विधायक दल के नेता को हटाने का अधिकार नहीं
-चुनाव-चिह्न राजनीतिक पार्टी का होता है, विधायक दल का नहीं
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
शिवसेना पार्टी और उसके चुनाव-चिह्न से जुड़े मामले पर बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय में हुई सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने जोरदार दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा कि कोई विधायक अपने-आप में राजनीतिक पार्टी नहीं होता। जब विधायक एक राजनीतिक दल छोड़कर दूसरे दल में चले जाते हैं, तो इससे चुनाव-चिह्न पर उनका अधिकार नहीं हो जाता। ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग और विधानसभा अध्यक्ष द्वारा लिए गए निर्णय गलत हैं।
सिब्बल ने कहा कि शिवसेना में हुआ घटनाक्रम कोई स्वाभाविक विभाजन नहीं था, बल्कि एक पूर्वनियोजित राजनीतिक षड्यंत्र था। पहले ३१ विधायक सूरत गए और उसके बाद उन्हें गुवाहाटी ले जाया गया। इस पूरी प्रक्रिया को बाद में राजनीतिक दल में टूट के रूप में पेश किया गया, जबकि वास्तविकता यह थी कि विधायकों को योजनाबद्ध ढंग से पार्टी से अलग किया गया। सिब्बल ने अदालत का ध्यान इस बात की ओर आकर्षित किया कि शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे ने केंद्रीय चुनाव आयोग के निर्णय के विरुद्ध चुनौती दी है। इसके साथ ही विधायक दल के नेता और मुख्य सचेतक के पदों से संबंधित विधानसभा अध्यक्ष के फैसलों को भी अदालत के सामने प्रश्नांकित किया है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की विशेष पीठ के समक्ष हुई। पिछली सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि चुनाव आयोग के निर्णय और विधानसभा अध्यक्ष द्वारा दिए गए फैसलों की न्यायिक समीक्षा की जाएगी।
आज भी सुनवाई जारी रहेगी
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की आगे की सुनवाई गुरुवार को दोपहर २ बजे निर्धारित की। सुनवाई के दौरान शिवसेना की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल अपनी दलीलें जारी रखेंगे। इस मामले की सुनवाई पर पूरे महाराष्ट्र की निगाहें लगी हुई हैं।
‘विधायक राजनीतिक दल नहीं होते’…सुप्रीम कोर्ट में सिब्बल का बड़ा तर्क
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील देते हुए कहा कि राजनीतिक दल और विधायक दल दो अलग-अलग संस्थाएं हैं। चुनाव-चिह्न राजनीतिक पार्टी का होता है, विधायकों के समूह का नहीं। उन्होंने कहा कि कोई निर्दलीय उम्मीदवार अपना चुनाव-चिह्न स्वयं चुन सकता है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ता है, तो उसे पार्टी द्वारा अधिकृत किया जाता है। चुनाव जीत जाने के बाद वह विधायक उस पार्टी के नाम, संगठन और चुनाव-चिह्न का मालिक नहीं बन जाता। उन्होंने कहा कि विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों को पार्टी के संगठनात्मक नेतृत्व को हटाने अथवा बदलने का अधिकार नहीं होता। यदि विधायकों का कोई समूह पार्टी नेतृत्व से असहमत है, तो वह पार्टी के भीतर निर्धारित प्रक्रिया अपना सकता है, लेकिन वह स्वयं को ही असली राजनीतिक दल घोषित नहीं कर सकता। सिब्बल ने कहा कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में ३१ विधायक पहले भाजपा-शासित गुजरात के सूरत गए और उसके बाद गुवाहाटी पहुंच गए। यह कोई अचानक हुआ राजनीतिक घटनाक्रम नहीं था। उन्होंने इसे एक सुनियोजित नाटक बताया।
२० जून २०२२ को विधान परिषद चुनाव के लिए मतदान समाप्त होने के बाद इस घटनाक्रम की शुरुआत हुई। उसी रात विधायकों को महाराष्ट्र से बाहर ले जाया गया। सिब्बल ने कहा कि यह दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता कि यह सब अचानक और बिना किसी योजना के हुआ। उन्होंने अदालत से कहा कि इस पूरे घटनाक्रम पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है, क्योंकि इससे राजनीतिक दलों में टूट और दल-बदल को प्रोत्साहन मिल सकता है। यदि विधायक दल में बहुमत जुटाने वाले समूह को ही मूल राजनीतिक पार्टी मान लिया गया, तो भविष्य में किसी भी राजनीतिक दल को उसके निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से तोड़ा जा सकेगा।
विधायक पार्टी प्रमुख को नहीं हटा सकते
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि यदि किसी राजनीतिक दल के विधायक मिलकर पार्टी के पदाधिकारियों को हटाने का निर्णय लेते हैं और उस पर अमल करते हैं, तो यह एक पूर्वनियोजित साजिश का संकेत है। उन्होंने कहा कि ऐसा कदम इस बात का प्रमाण माना जा सकता है कि संबंधित विधायकों ने स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है। सिब्बल ने यह भी कहा कि ऐसे कृत्यों का देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। सिब्बल की दलीलों पर प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि विधायक किसी राजनीतिक दल के नेता को उसके पद से नहीं हटा सकते। शिवसेना की ओर से पेश किए गए पक्ष को सुनते हुए अदालत की यह टिप्पणी मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
`विधायक दल पर राजनीतिक दल का नियंत्रण होता है’
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान न्यायालय ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि विधायक दल पर नियंत्रण राजनीतिक दल का होता है। इसलिए राजनीतिक दल का कोई भी वैध निर्णय, विधायक दल में मौजूद बहुमत की इच्छा से भी ऊपर माना जाएगा। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि यह पूछना कि विधायक दल में किसके पास बहुमत है, अपने आप में गलत प्रश्न है। उनके अनुसार, वास्तविक प्रश्न राजनीतिक दल से संबंधित होना चाहिए, क्योंकि विधायक दल राजनीतिक दल का ही हिस्सा होता है।
इस पर भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि राजनीतिक दल में बहुमत का अर्थ और उसकी सीमाएं अलग-अलग परिस्थितियों में भिन्न हो सकती हैं। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि किसी राजनीतिक दल की परिभाषा और बहुमत का निर्धारण संविधान या संबंधित नियमावली के अनुसार होना चाहिए।
‘एकनाथ शिंदे ने कहा था कि उन्हें महाशक्ति का समर्थन प्राप्त है!’
सुप्रीम कोर्ट में गरजे कपिल सिब्बल
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने प्रश्न किया कि क्या चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों अथवा पार्टी के संविधान में बहुमत के आधार पर निर्णय लेने की कोई निश्चित व्यवस्था है। इस पर कपिल सिब्बल ने शिंदे गुट और भाजपा के बीच हुई राजनीतिक साझेदारी की ओर अदालत का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि एकनाथ शिंदे ने स्वयं सार्वजनिक रूप से कहा था कि उन्हें एक बड़ी राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी अथवा ‘महाशक्ति’ का समर्थन प्राप्त है। शिवसेना ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर शिंदे गुट की पार्टी-विरोधी गतिविधियों की जानकारी दी थी। सिब्बल ने कहा कि शिंदे गुट के प्रतिनिधियों ने किसी राजनीतिक दल के पदाधिकारियों से मुलाकात की थी अथवा नहीं, इस संबंध में भी प्रमाण अदालत के सामने प्रस्तुत किए जाएंगे।
कपिल सिब्बल द्वारा प्रस्तुत प्रमुख बिंदु
चुनाव आयोग ने शिवसेना के एक गुट को अधिकृत राजनीतिक दल के रूप में मान्यता दी थी। इसके बाद पार्टी प्रमुख पद पर आपत्ति जताई गई।
और तीन उपनेताओं की नियुक्ति की गई। पार्टी संविधान में किए गए परिवर्तन के आधार पर ११ सदस्यों की कार्यकारिणी तथा अंतर्गत राजनीतिक व्यवस्था बनाए जाने का दावा किया गया था। लेकिन २०१८ में ऐसी कार्यकारिणी से जुड़ी समस्याओं को देखते हुए चुनाव आयोग ने संगठन में सुधार करने की सलाह दी थी। बाद में उद्धव ठाकरे ने एकनाथ शिंदे को पार्टी में एक नेता के तौर पर नियुक्त किया था। चुनाव आयोग के पास उपलब्ध पार्टी संविधान के अनुसार यह नियुक्ति की गई थी और उस समय किसी ने इस पर आपत्ति नहीं की थी।
सिब्बल ने कहा कि एकनाथ शिंदे और उनके समर्थकों ने ही बाद में बगावत की। उनकी नियुक्ति उद्धव ठाकरे ने पार्टी प्रमुख के नाते की थी। लोकसभा चुनाव २०१९ और विधानसभा चुनावों में उम्मीदवारों का चयन और टिकट वितरण उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में हुआ था। २०१३ और २०१८ में पार्टी संविधान के अनुसार संगठनात्मक चुनाव भी हुए थे। चुनाव आयोग के पास इनकी जानकारी उपलब्ध थी। सिब्बल ने पूछा कि यदि पार्टी संविधान और संगठनात्मक चुनावों को चुनाव आयोग ने उस समय स्वीकार किया था, तो बाद में उन्हीं चुनावों और उसी संगठनात्मक व्यवस्था को अमान्य वैâसे माना जा सकता है। उन्होंने कहा कि २०१९ से २०२२ तक उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री थे और एकनाथ शिंदे उनके मंत्रिमंडल में मंत्री थे। २०१३ या २०१८ में पार्टी संविधान में कोई बदलाव नहीं किया गया था। इसके बावजूद चुनाव आयोग ने पार्टी संविधान के अनुसार हुए चुनावों को स्वीकार नहीं किया।
सिब्बल ने कहा कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना के वास्तविक पार्टी होने पर कभी कोई संदेह नहीं था। चुनाव आयोग और विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष भी ऐसा कोई संदेह व्यक्त नहीं किया गया था। उद्धव ठाकरे ने पार्टी प्रमुख के रूप में एकनाथ शिंदे को विधायक दल का नेता और सुनील प्रभु को मुख्य सचेतक नियुक्त किया था। इन नियुक्तियों की जानकारी विधानसभा अध्यक्ष को भी दी गई थी।
२० जून २०२२ को विधान परिषद चुनाव के लिए कुछ विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की। इसके बाद पार्टी में तनाव पैदा हुआ। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में ३१ विधायक भाजपा-शासित राज्य चले गए। वे पहले सूरत और उसके बाद गुवाहाटी पहुंचे।
सिब्बल ने कहा कि यह कोई संयोग नहीं हो सकता। सभी विधायक एक ही होटल में ठहरे थे। वहां से विधायकों ने हस्ताक्षरयुक्त पत्र भेजा। २१ जून को उद्धव ठाकरे ने बैठक बुलाकर शिंदे गुट से संबंधित पदों और नियुक्तियों पर निर्णय लिया।
शिंदे गुट ने अजय चौधरी की नियुक्ति के निर्णय को भी चुनौती दी। उसे तत्कालीन विधानसभा उपाध्यक्ष के पास भेजा गया और उपाध्यक्ष ने उसे मान्यता दे दी।
सिब्बल ने कहा कि विधायक दल का कोई स्वतंत्र संगठन नहीं होता। उसकी शक्तियां पार्टी प्रमुख से प्राप्त होती हैं। पार्टी का अलग संविधान होता है और विधायक दल का कार्य उसी के अनुसार चलता है। विधायक दल को अलग राजनीतिक पार्टी मानने की कोई व्यवस्था नहीं है।
बैठक में गैरहाजिरी को ही आधार बनाया गया
पार्टी की बैठक में उपस्थित रहने का व्हिप जारी किया गया था। इसके बावजूद कुछ विधायक बैठक में उपस्थित नहीं हुए। बाद में बैठक में गैरहाजिर रहने को उनके विरुद्ध कार्रवाई का आधार बनाया गया।
सिब्बल ने कहा कि बैठक में कोई गुप्त निर्णय नहीं लिया गया था। राज्यपाल को बदली हुई परिस्थितियों की जानकारी दी गई थी। विधानसभा अध्यक्ष को भी संबंधित जानकारी देने और दस्तावेज भेजने की प्रक्रिया पूरी की गई थी।
उन्होंने कहा कि पार्टी प्रमुख के पास विधायक दल के प्रमुख को हटाने का अधिकार होता है। इस संबंध में चुनाव आयोग के समक्ष भी आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे। लेकिन आयोग ने उन पर पर्याप्त विचार नहीं किया।
बहुमत के नाम पर लोकतंत्र को खतरा
सिब्बल ने कहा कि यदि विधायकों के बहुमत को ही राजनीतिक पार्टी मान लिया गया, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था को भारी नुकसान होगा। सत्ता और बहुमत के सहारे निर्वाचित प्रतिनिधि मूल राजनीतिक दल को ही अपने कब्जे में ले सकते हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, लेकिन वे पार्टी के संगठन, संविधान और कार्यकर्ताओं से ऊपर नहीं हो सकते। राजनीतिक दल केवल विधायकों का समूह नहीं है। उसमें लाखों कार्यकर्ता, पदाधिकारी और सदस्य शामिल होते हैं। आज विधायक दल के सदस्य दूसरे राजनीतिक दल में विलीन हो सकते हैं अथवा पार्टी छोड़ सकते हैं, लेकिन पार्टी का चुनाव-चिह्न अपने साथ नहीं ले जा सकते। जिस चिह्न पर चुनाव लड़कर वे निर्वाचित हुए, वह चिह्न मूल राजनीतिक दल का होता है।
इस प्रकार केवल विधायकों की संख्या के आधार पर पार्टी का नाम और चुनाव-चिह्न सौंपना संविधान, दल-बदल विरोधी कानून और लोकतांत्रिक व्यवस्था, तीनों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
शिंदे सरकार का गठन पूरी तरह गैरकानूनी था!
शिंदे गुट में शुरुआत में १६ विधायक थे, बाद में उनकी संख्या २२ हुई। विधायक दल के नेता को हटाने और बहुमत सिद्ध करने की इस प्रक्रिया को राज्यपाल द्वारा मान्यता दी गई। लेकिन शिवसेना को अपनी बात रखने अथवा बहुमत सिद्ध करने का समुचित अवसर नहीं दिया गया। सिब्बल ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव इस मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी, क्योंकि विधायकों की अयोग्यता पर निर्णय लेने का अधिकार अध्यक्ष के पास था। राहुल नार्वेकर ने विधानसभा अध्यक्ष बनने के बाद एकनाथ शिंदे को विधायक दल का नेता और भरत गोगावले को मुख्य सचेतक के रूप में मान्यता प्रदान कर दी। इस प्रकार शिंदे गुट को पूर्ण वैधानिक मान्यता दे दी गई।
सिब्बल ने कहा कि वास्तविकता यह है कि शिंदे सरकार का गठन पूरी तरह गैरकानूनी था और उससे जुड़ी बाद की सारी कार्रवाइयां भी उसी गैरकानूनी आधार पर खड़ी थीं।
