अनिल मिश्र / पटना
बिहार प्रदेश की धार्मिक, आध्यात्मिक, पौराणिक एवं ऐतिहासिक नगरी गयाजी जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर की दूरी पर पंचानपुर में स्थित दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन में अंतरराष्ट्रीय श्रम प्रवास के एक ऐसे पहलू पर ध्यान दिलाया गया है, जिस पर अब तक कम ध्यान दिया गया है। इसमें वेतन की चोरी और भारत लौटने के बाद प्रवासी श्रमिकों को अपने बकाया वेतन की वसूली के लिए करना पड़ने वाला संघर्ष शामिल है।
यह अध्ययन सीयूएसबी में इकोनॉमिक स्टडीज एंड पॉलिसी की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. फिरदौस फातिमा रिजवी और उनके शोधार्थी श्री विक्रम (डेवलपमेंट स्टडीज) ने किया है। ‘जीसीसी क्षेत्र से लौटे भारतीय प्रवासियों में वेतन की चोरी और बकाया राशि की वसूली’ (Wage Theft and Post-return Due Recovery among Indian Migrants from GCC Region) शीर्षक वाला यह शोध लेख ‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ (ईपीडब्ल्यू) के हालिया अंक में एक विशेष लेख के रूप में प्रकाशित हुआ है। ईपीडब्ल्यू भारत में सार्वजनिक नीति पर चर्चा के लिए प्रतिष्ठित अकादमिक पत्रिकाओं में से एक है, जो अर्थव्यवस्था, समाज, विकास और सार्वजनिक नीति पर व्यापक बहस के साथ विद्वतापूर्ण शोध को जोड़ती है।
इस मौके पर दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह ने एक महत्वपूर्ण और अत्यंत आवश्यक विषय पर अध्ययन करने के लिए डॉ. रिजवी और उनके शोधार्थी विक्रम को बधाई दी है।
इस गंभीर विषय पर विवरण देते हुए डॉ. रिजवी ने कहा कि बिहार लंबे समय से भारत के प्रमुख श्रम-प्रेषक राज्यों में से एक रहा है। सीमित रोजगार के अवसर, औद्योगीकरण और शहरीकरण का अपेक्षाकृत निम्न स्तर और विकास संबंधी लगातार चुनौतियां ऐतिहासिक रूप से राज्य से बड़े पैमाने पर श्रम प्रवास का कारण रही हैं, खासकर जीसीसी देशों के लिए।
यह अध्ययन सिवान जिले में 385 लौटे हुए प्रवासी श्रमिकों से प्राप्त जमीनी सबूतों पर आधारित है। दरअसल, बिहार का सिवान जिला खाड़ी देशों में अंतरराष्ट्रीय श्रम प्रवास के लिए राज्य के प्रमुख केंद्रों में से एक है। कई प्रवासियों के लिए श्रम शोषण के परिणाम भारत में अपने गांवों और परिवारों में लौटने के काफी समय बाद भी बने रहते हैं।
अध्ययन का सबसे चौंकाने वाला निष्कर्ष जीसीसी देशों में उनके रोजगार के दौरान वेतन की चोरी के व्यापक प्रचलन से संबंधित है। उन्होंने नियोक्ताओं द्वारा अनुचित व्यवहार की भी बात कही। ‘वेतन की चोरी’ शब्द कर्मचारियों को देय वेतन और लाभों से गैरकानूनी रूप से वंचित करने की स्थिति को दर्शाता है। इस तरह के उल्लंघन कई रूपों में हो सकते हैं, जैसे वेतन का भुगतान न करना, वेतन रोक लेना, गैरकानूनी कटौती और रोजगार संबंधी लाभों से वंचित करना।
इस निष्कर्ष के नीतिगत स्तर पर महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं। लेखकों का तर्क है कि शिक्षा से जागरूकता तो बढ़ सकती है, लेकिन सिर्फ जागरूकता से ढांचागत नुकसानों को दूर नहीं किया जा सकता, खासकर तब, जब वेतन और काम की शर्तों पर नियोक्ता का नियंत्रण हो और कामगार के लौटने के बाद वह उस देश की संस्थाओं से अलग हो जाए।
लेखकों ने गंतव्य देशों में नियोक्ताओं और वेतन भुगतान की बेहतर निगरानी की मांग की है। उन्होंने अनिवार्य इलेक्ट्रॉनिक वेतन भुगतान प्रणाली, नियोक्ता की जवाबदेही पर आधारित ढांचा, रोकथाम के लिए सख्ती, संस्थागत जिम्मेदारी और सीमा-पार सहयोग जैसे उपायों का सुझाव दिया है।
