मुख्यपृष्ठसमाज-संस्कृतिअसीम वकार की दूरी: 2027 में ओवैसी खेमे की चुनौती

असीम वकार की दूरी: 2027 में ओवैसी खेमे की चुनौती

हिमांशु राज

अलीगढ़ और पूर्वांचल की सियासत में असीम वकार की ओवैसी से दूरी नए राजनीतिक तूफान की झलक है। लंबे समय तक ओवैसी के भरोसेमंद चेहरे रहे वकार का खुला असंतोष और प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली के साथ मतभेद इस बात का संकेत हैं कि मुस्लिम नेतृत्व में दरारें उभर रही हैं। पार्टी में अपमानित महसूस करने की बातें ओवैसी के संगठनात्मक समन्वय की परीक्षा लेंगी।
राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि यदि वकार समाजवादी पार्टी या कांग्रेस से जुड़ते हैं तो 2027 की चुनावी रणभेरी पर इसका सीधा असर होगा। सपा के लिए यह मौका होगा कि वह पूर्वांचल और बुंदेलखंड में हिंदू-मुस्लिम समीकरण को और मजबूत करे; कांग्रेस के लिए यह मुस्लिम वोट बैंक में फिर से पैर जमाने का अवसर होगा। फर्क तभी दिखेगा, जब वकार जमीनी सक्रियता और संगठनात्मक काम में शामिल होंगे। सिर्फ नामवर स्थानांतरण का वोट पर सीमित असर रहेगा।
इसी बीच आरएलडी के रामाशीष राय का इस्तीफा और उनकी संभावित सपा या कांग्रेस में एंट्री पश्चिमी उत्तर प्रदेश के समीकरण बदल सकती है। जाट और अन्य समुदायों के आंदोलनों के बीच यह कदम स्थानीय सीटों पर निर्णायक हो सकता है। अगर ये नेता संगठनात्मक तौर पर मजबूत हस्तक्षेप करें तो ओवैसी नेतृत्व को उन सीटों पर सीधा झटका लग सकता है, जहां मुस्लिम वोट निर्णायक रहते हैं।
निश्चित रूप से 2027 से पहले चुनावी नक्षत्र फिर से बन रहे हैं। दो अहम कारक निर्णायक होंगे—क्षेत्रीय नेताओं की स्वीकार्यता और दलों का जमीनी गठबंधन-प्रबंधन। समय रहते मतभेद सुलझे तो ओवैसी का प्रभाव बरकरार रह सकता है; नहीं तो सपा और कांग्रेस के लिए यह एक सुनहरा अवसर है कि वे भरोसेमंद स्थानीय चेहरों को अपने पाले में लाकर वोट-ब्लॉक बदल दें। 2027 का चुनाव इन चालों का फल दिखाएगा और फिलहाल राजनीतिक दल मैदान सजाने में तेज हो चुके हैं।

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