सही मार्गदर्शक है
हमारे अंतस्थ में विराजमान शांत आत्मा।
जब-जब मन भटकता है,
आत्मा की आवाज उसे
उचित-अनुचित का ज्ञान कराती है।
मन हमारे अधीन है।
जहां चाहे,
इस मन रूपी घोड़े को
किसी भी दिशा में दौड़ाएं…
उसके अंजाम के जिम्मेदार
हम खुद ही होंगे।
परंतु हम स्वयं भी
आत्मा की दया पर पल रहे हैं।
मन और आत्मा के संघर्ष में
फैसला आत्मा की आवाज सुनकर कीजिए।
विचलित मन शांत होगा,
तो आपका भय फुर्र हो जाएगा।
आप निश्चित ही
सही दिशा की ओर अग्रसर होंगे।
आत्मा के बिना मनुष्य का अस्तित्व
अब ढहा कि अब मिटा।
मनुष्य को जिलाए रखने में
आत्मा ही सर्वोपरि है।
मन का क्या है—
गिरगिट की तरह वह अपना
‘मन’ बदलता रहता है।
रंग नहीं, क्योंकि किसने देखा है
मन का आकार और रंग!
हां, मनुष्य की सोच और व्यवहार से
“मन के ढंग” का पता चल जाता है।
“आत्मा कभी टस से मस”
नहीं होती है।
जब आपकी कोई समस्या
आपसे न सुलझे,
तो अपनी उलझन के समाधान हेतु
अपनी दुविधा आत्मा के हवाले कर दो…
आत्मा ही उचित न्याय कर सकेगी।
परंतु इसके लिए
आपका आत्मा के साथ
संपर्क में बने रहना
अति आवश्यक है।
बिना दुनियावी कचहरी में पेशी दिए,
तो ‘दुनियावी फैसले’ भी
संभव नहीं हो सकते हैं।
अतः आत्मा को ही
अपना हितकर जानें।
आपको किसी भय या शंका का
कोई स्थान नहीं होगा।
अतः-तथास्तु!
विचार शुद्ध -आत्मा निर्मल -जीवन सफल
-त्रिलोचन सिंह अरोरा
